भारतीय गाँव और महानगर
नगर और गाँव की तुलना : भारतीय गाँव महानगर में वही संबंध होते है, जो सीधे-सादे बूढ़े बाप और उनकी अल्ट्रा माडर्न संतान में होता है। गाँव शहरों की सींचते हैं, उने धन, श्रम, माल देते है ; परंतु शहर फिर भी गाँव की और ताकते तक भी नहीं।
गाँव के सुख : भारत की अधिकांश जनता गाँव में रहकर खेती करती है। गाँव में प्रकति का साथ रहता है। लंबे-चौड़े खेत, बाग़-बगीचे, कोयल की कुक, सर्दी-गर्मी-बरसात का पूरा आनंद ग्रामीण जीवन में ही लिया जा सकता है। प्रकति की गोद में प्रदुषण का नहीं, हरियाली, सवाच्छ्ता और सवास्थ का साम्राज्य रहता है।
गाँव के दुःख : दुर्भाग्य से आज गाँव में आभाव ही आभाव हैं। न सड़कें, न बिजली, न पानी, न आधुनिक वस्तुएँ। सब चीजों के लिए शहरों की और ताकना पड़ता है। डॉक्टरों के नाम पर नीम-हकीम या आर.एम.पी. ; सकूलों के नाम पर अनाथालय से विद्यालय, सफाई के नाम पर कूडे के ढेर, गोबर और कीच से लथपथ जिंदगी को देखकर सचमुच वहाँ रहने का मन नहीं करता।
महानगरों के सुख : महानगरों के पास सरे सुख-साधन तो हैं परंतु फिर भी यहाँ का आदमी सुखी नहीं है। यहाँ निरंतर संधर्ष, होड़, इर्षा, षड्यंत्र, दुर्घटना का बोलबाला है। यहाँ के सभी निवासी ऊँचे उठने योर उड़ने के लिए आतुर हैं। इसके लिए आपसी खींचतान और स्वार्थ का जमकर प्रदर्शन होआ है। महानगरों में रिश्तों के मधुर संबंध गायब हो गए हैं। च्कचोंध के मरे लोग आत्मीयता और सनेह का रस खो बैठे हैं।
प्रदषण : महानगरों में बढता हुआ प्रदषण और बढती हुई दुर्घटनाएँ और भी चिंता का कारण हैं। धुएँ, शोर और कृत्र्मिता के कारण महानगरों में खान-पान, रहन-सहन पवित्र नहीं रह गया है। रोज ढेर सारा धुआँ और पेट्रोल हमारी सांसों में चले जाता है। सड़कों पर भीड़ इतनी बढ़ गई है कि नित्य जानलेवा दुर्घटनाएँ बढ़ रही हैं।
निष्कर्ष : बास्तव में गाँव और महानगर – दोनों के अपने-अपने सुख और दुःख हैं। यदि गावों में महानगरों की सुख-सुविधाएँ बढ़ा दी जाएँ और महानगरों में गाँव की सहजता, सादगी, आत्मीयता उत्पन्न कर दी जाय तो दोनों जगहें आनंदमयी हो सकती हैं।










0 Comments