करत-करत अभ्यास के
मध्यकालीन हिंदी-काव्य (रीतिकाल) के एक प्रसिद्ध नीतिवान और अनुभवी कवि वृंद की यह उक्ति अपने पूर्ण रूप में इस प्रकार है :
करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निसान।।
अर्थात जिस प्रकार कुंए की जगत के पत्थर पर कोमल रस्सी की बार-बार रगड़ पडऩे से वह घिसकर निशान वाला हो जाता है, उसी प्रकार निरंतर अभ्यास और परिरम करने वाला जड़ या असमर्थ व्यक्ति भी एक न एक दिन सफलता अवश्य पा लेता है। सचमुच, कवि वृंद ने बड़ी ही अनुभव सिद्ध और मार्के की बात कही है। इस उक्ति के माध्यम से उन्होंने बताया है कि अभ्यासी और परिश्रमी व्यक्ति के लिए जीवन में कुछ भी कर पाना असंभव या कठिन नहीं हुआ करता। दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि यदि व्यक्ति लगन के साथ निरंतर चलता रहेगा, तो एक न एक दिन अपनी मंजिल तक पहुंच ही जाएगा। यह अनुभवसिद्ध बात है। कुछ पाने के लिए केवल अच्छा इरादा ही काफी नहीं हुआ करता, उसके लिए निरंतर परिश्रम और अभ्यास भी आवश्यक हुआ करता है। कहावत है कि कुंआ प्यासे के पास चलकर नहीं आया करता, प्यासे को ही चलकर उसके पास पहुंचना पड़ता है। यह चलना ही अभ्यास ओर परिश्रम-रूपी रस्सी है जो सिल यानी पत्थर पर भी सफलता के निशान छोड़ जाया करती है। अत: निरंतर अभ्यास करते रहना चाहिए। यह निंरतर अभ्यास ही सफलता पाने की कुंजी है। अभ्यास-निरत व्यक्ति को सफल होने पर कोई नहीं रोक सकता।
कहावत क्या, अनुभव सिद्ध बात है कि रगडऩे से ही पत्थर में से आग और तिलों में से तेल पैदा हुआ करते हैं। किसी प्रकार सामान्य बुद्धि, शक्ति और स्वल्प साधनों वाला व्यक्ति भी जब कुछ करने का इरादा बना तदुनुरूप कार्य आरंभ कर देता है, तो प्राय: चमत्कारपूर्ण परिणाम सामने आया करते हैं। मंजिल केवल तेज चाल वाले खरगोशों के लिए ही नहीं हुआ करती। वे यों अक्सर अपनी तेजी से शेखी में भटक जाया करते हैं। मंद चाल होने पर भी निरंतर चलते रहने वाले कछुए अक्सर मंजिल पर पहुंच सफलता के आनंद का पारितोषित पाया करते हैं। खरगोश-कछुए की यह प्रचलित नीति-कथा भी यही सिद्ध करता है कि ‘करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान। अत: आज से ही सब प्रकार के आलस्य और भय त्यागकर धीरे-धीरे सही, चल पडि़ए। सफलता की मंजिल बड़ी बेताबी से चलने वालों की राह देखा करती है।
उपर्युक्त सूक्ति में कवि मात्र यही कहना चाहता है कि जीवन निरंतर सजग रहकर निरंतर चलते रहने अर्थात परिश्रम करने वालों का ही हुआ करता है। एक बार की हार या जड़ता की अनुभूति से बैठे रहने वाले साधनों की सुलभता में भी सफल नहीं हुआ करते।










0 Comments