स्वर्गारोहिणी
Swargarohini
आज मुक्त भारत फ जीवन
आज तप्त धरा-समीरण,
संतापित-सोसित छ केवल
अब-तक अपनी गढ़ धरणी,
भाव-विह्वल छ स्वर्गारोहिणी।
खून-पसीना लतपत तन-मन,
निरास-हतास दुःखी जन-जीवन,
अथक स्रम-पीड़ित अन्तर्मन,
कब-तक किस्मत मा अपणी
या विवसता, यु उत्पीड़न ?
आज दुःखी छ गढ़-धरणी,
भाव-विह्रल छ स्वर्गारोहिणी।










0 Comments