सो 'है' कहो तो है नहीं 'नाहीं' कहो तो है



एक बार प्रवचन के बाद बुद्धदेव से एक व्यक्ति ने प्रश्न किया, "आप तो ईश्वर को मानते हैं, लेकिन मैं नास्तिक हूँ और ईश्वर को नहीं मानता। इस बारे में आपकी क्या राय है?” बुद्ध बोले, “तुम गलत हो। संसार में ईश्वर के अलावा सत्य कुछ भी नहीं, इसलिए तुम्हें उस पर श्रद्धा करनी ही चाहिए।"

कुछ दिन बाद एक-दूसरे व्यक्ति ने बुद्धदेव से प्रश्न किया, "प्रभो! लोग ईश्वर को नहीं मानते, लेकिन मेरी तो उन पर बड़ी श्रद्धा है। क्या मैं सही नहीं हूँ? आपका इस बारे में क्या दृष्टिकोण है?”

"आप गलत समझ रहे हैं। ईश्वर का अस्तित्व असत्य बात है, इसलिए उसे मानने का प्रश्न ही नहीं उठता।”

बुद्धदेव का प्रिय शिष्य आनंद उक्त दोनों अवसरों पर उपस्थित था। वह सोचने लगा, “देव कभी तो कहते हैं कि ईश्वर के अलावा सत्य कुछ नहीं और कभी कहते हैं कि ईश्वर के अलावा असत्य कुछ नहीं। आज रात्रि को शंका का समाधान कर वास्तविकता का पता लगाना ही चाहिए।" किन्तु इसी बीच एक शिष्य ने तथागत से पूछ लिया, "ईश्वर के अस्तित्व पर लोग विवाद करते हैं। आप ही बताइए ईश्वर है या नहीं।" बुद्धदेव ने प्रश्न को सुना-अनसुना कर जिस विषय पर बात कर रहे थे, उसी को जारी रखा। शिष्य थोड़ी देर तक उत्तर की प्रतीक्षा करता रहा, बाद में उठकर चला गया।

लेकिन यह प्रश्न तो आनंद को चैन नहीं लेने दे रहा था। उसने पूछ ही लिया, "देव कभी आप कहते हैं, 'ईश्वर है', तो कभी कहते हैं 'नहीं है' और अभी-अभी इस बारे में जब एक शिष्य ने वास्तविकता जाननी चाही, तो आपने उत्तर ही नहीं दिया।”

तथागत बोले, “आनंद! तूने इसे गंभीरता से क्यों लिया? ये प्रश्न तेरे लिए तो थे नहीं । वास्तव में मैं उन लोगों की मान्यता और धारणा को तोड़ देना चाहता था। जो नास्तिक होता है, उसकी आत्मा परतंत्र होती है। मैं उसकी इस मान्यता को दूर करना चाहता था, इसलिए मैंने उससे कहा कि 'ईश्वर है', ताकि वह इस पर विचार करे और उसे ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास हो ।

“दूसरे व्यक्ति की इस मान्यता को भी कि ईश्वर का अस्तित्व मैं दूर करना चाहता था। मैं चाहता था कि वह अपनी धारणा की जंजीरों हो और सत्य को जानने की स्वयं पहल करे।" मुक्त

“रहा तीसरा शिष्य; तो उसका स्वयं का कोई मत न था । मेरी इच्छा थी कि वह यह जानने का प्रयास करे कि ईश्वर सचमुच है या नहीं। अलग-अलग उत्तर देने का उद्देश्य यही था कि वे अपनी मान्यता और सिद्धान्तों में न बँधे रहें तथा उससे अलग होने का प्रयास करें।"