ग्वेर-छ्वारा
Gawer Chawara
सबेर उटिक उ मल गाडद ।
घास-पाणी, लाखुड़ काटद ।
पल ऊ-बाड़ो घरम पाकद ।
गोरुक दगड़ दुःख-सुख बाँटद ।।
लत्ता-कपड़ा पर लरका-तरकी।
घुमायूँ रैद उ ताकुलिकि चरखी।
झगुलि-टुपलि छ चिरखा-फुरकी।
नरभगी जोगुन उ ऐथर नि सरकी ।।
थाकुलु छ वेकू मालुक पत्ता।
जुत्त छ तैकू टाँट्यूक गत्ता।
गीठी-तड़क खणद उ खत्ता।
पाँदू क्य छ ? कुछ न कत्ता।।
ग्वेर-छ्वारा कबि भ्यालुंद पड़द,
कबि उ डाँड्यूक चुपा मा चड़द ।
बेडु-तिमलुक दाँयंक लोभ मा,
कबि उ डाल्यू मा चड़द-उतरद ।।
ग्वेर-छ्वारा यु किल पैदा ह्वाई ?
कंधा ऊँद कामुलु, मुंड मा मुंडकि धरी राई।
ठोकुरुक घाव कभि नि भर्याई ।
माटू-चपण्याँ वेकी दवे राई ।।
दूध-घी खाँणक जब बारि आँद,
ग्वेर-छवारक कखि पता नि पयाँद,
हडकुन-मुडकुन उ इनि दिख्यांद,
जन सौ बरसुक क्वी बुढ्या ह्वान्द।।
आग जगणिवेम छ अग्यलू ।
तमाखु पीणक पतौंक पतव्याडू ।
परालक वेक हूँद बिछौंण,
चिनिखि-जाछिन वेम औण ।।
हल-ताँगल, गोट-गुठ्यारी।
पुगड़-पाटलि छ वेकू प्यारी।
बूण-लौंण, गुडण क्यारी।
वेकी दुनिया वेकू न्यारी ।।










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