हाय! परदेस 
Haye Pardes




अपणुं नौंक रावण छौं मी, मछ मरोडिक बत द्यूँ ।

पैल त्यार, स्वार-भार, अपण-परा, ते त्यार । 

दुस्मन बण ल्यूं । 

फिर सुचुलु कनकैक, त्वे ते सज़ा द्यूँ । 

यू०पी० कु भैय्या। पैलि अपणी नैय्या कू बण खिवैय्या। 

बड़ आई भारत माँ कू कृस्ण कन्हैय्या । 

न जणी कख बिटक, ए गेन भूख-नंग, दिल क तंग, 

मित सुचुदू कनकैक- तुम तै भगै द्यूँ । 

जतना जल्दी हवाऊ, सब्बि इखन भागि जाऊ, 

मित अच्छू-खासू तै - एक्सीडेंट मा मरवै द्यूँ । 

अगर यख रैण चाँदि, अपनी भाषा-प्रान्त भुल दी। 

अफु तै इख कि बतै दी।

तेरी पढ़-लिखै, कर्तव्य-कर्म, सेवा-धर्म, लम्ब-चौड़ भाषण, 

यख कंन नि सुण, कैन नि पुछण, 

यख त चोरी- हेराफेरी, जुमर्जी कर ली ।

खब कीसा भर ली। 

पर, सब-कुछ देखि-सूणिक भि--साफ़ बोल्दी—

मीन कुछ नि द्याखी, कुछ नि चाखी, कुछ नि सूंणी'।

निथर बुरु से बुरु इल्जाम लगै दयूल, 

चोर, बलात्कारी त्वे तै बतै दयूल । 

कैक बदल सूण, त्वे ते पिटवै यूल, त्वे ते मिटवै दयूल । 

या कैक जुर्म मा त्वे तै जेल भिजवै दयूल ।