त्रिसूल 
Trishul



सिब जी ! त्यार त्रिसूल पर अब वा धार नी छ । 

दुराचायूँक छाती चीरिक अब ऊ हूँद पार नी छ । 

त्रिसूल भि त्यार अब तीन सूल ही त दींद । 

भक्त तै भ्रम अर भूल ही त दीद। 

त्यार आँख्यू” मा भि कुम्भकरणी नींद समै ग्याई । 

निथर धरतिक यी चोख-पुकार सं णिक, 

तू दौडिक क्यो कू नि आई ?