कलियुग कू उपदेस
Kalyuk Ku Yupdes



जब तक जान पर जान छ कमर तोडिक जी। 

कैमन पैसा मागिक देसी ठर्रा पो ।।1।। 


क्वी राजा हाऊ, हणी दी, त्वेत ये से क्या। 

चार दिन की चाँदनी, मौज-मजा मा रा ।।2।। 


धर्म-कर्म फंड फूक, घर-बारक चिन्ता छोड़। 

जुआ-दारुक राह पर, जीवन धारा मोड़ ।।3।। 


हूणहार ह्रको रैद, छोड़ रूण अर घूण । 

किस्मत मा 'जू कुछ लिख्यू, आखिर वेनी हंण ।।4।। 


जुआ-माँस अर दारू से कर जीवन मा प्यार। 

ये की खातिर मोलि या अमूल्य देह संसार ।।5।। 


सीण बराबर सुख नी, अर दोण बराबर दुःख । 

सब कुछ फंड फूकिक कुंयाँ जैक लुक ।।6।। 


अरे सहरी ! सूण जरा, बदल गाँव को चाल ।

माँ-बाप त घर छोड़िक, तख देसो कुत्ता पाल ।।7।।