सतयुग कू उपदेस
Satyug Ku Updesh
ये असार-संसार मा केवल द्वी छन सार ।
विश्व-प्रेम अर मानव सेवा से सम्भव छ जीव उद्धार ।।1।।
मांस-मदिरा से ना कर, ये जीवन बेकार ।
जेकू खातिर मीलि यु, कर वेकू व्यापार ।।2।।
सूणी-सुणाई बात पर, ना कर तू विश्वास ।
यी दुनिया की बातुन, ना ह तू उदास ।। 3।।
इन क्वा ये संसार मा, जे ते नो दु:ख-दर्द।
सब प्रभु पर छोड़िक, कर दू जा तू फर्ज ।।4।।
अरे मूढमति ! सूण जरा, बदल बेढगी चाल ।
जु डाल लगाल कांडक, उ आम कखन खाल ।।5।।
कुसल-क्षेम अर मृदु वचन बोल सकदो त बोल ।
औछी यों औकातक ना पीट तू ढोल ।। 6 ।।
जैम जेक भंडार छ, वेन वीत दीण।
कड़वी बात सूणीक ना कर कैसे घीण ।। 7 ।।
दिबतौंक नौं लेक, तै बाखरु ना मार ।
पुनर्जन्म मा उ फिर खाल गाढल त्यार ।। 8 ।।
हर्ता-कर्ता क्वी और छ, तू देह चिन्ता छोड़।
परोपकार की राह पर जीवन धारा मोड़ ।। 9 ।।
धूप-छाँह सी ज़िदगी, इनि सोचिक डर।
मांस-मदिरा छोड़िक, धर्म-कर्म कुछ कर ।। 10 ।।










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