सराद 
Sarad




ह. रे बिटा ठिववा! 

गाँव मा त्वी ले छ्याई ठीक, 

बकै त भूत-प्रेतू मन भि माँगदन भीख । 

पर अब तेरी बि खज्यात ए ग्याई। 

अरे! सूण, 

त्यार बाबुन हैक जन्म ली आई।

ऊ पहाड़ी चीता, 

पुनाममा बाघ ह वे ग्याई। 

तीन वेक अब य कन सराद कन्न आई ? 

अब त ऊ हररोज हिरणं तै खाँद । 

ज् मिल्द, बकी खन प्याँद, 

अब ऊ नास्तिक, मांसाहारी छ । 

खादुलु पसु-पक्ष्य क परिवारी छ। 

तू सराद पर वेकी--

हलुवा-पूरी, खीर पकाँदो। 

साकाहारी विप्र-भोज कराँदी । 

क्यों कुण त इन ढौंग रचाँदी ? 

यु कन पितृ-सराद मनाँदी ? 

क्य इनकैक वेकी तप्ति हवेली ? 

मुक्ति हवेली ?