चिड़ियाघर की सैर 
Chidiyaghar Ki Sair



वैसे तो सभी शहरो में देखने लायक अनेक वस्तुएं होती है, परन्तु यदि कहीं चिड़ियाघर हो तो उसकी तुलना में और सभी दर्शनीय वस्तुएं फीकी पड़ जाती हैं मुझे चिड़ियाघर देखने का विशेष रूप से चाव है

और अब तक मै भारत के लगभग सभी बड़े-बड़े चिड़ियाघर को देख चुका हूँ। फिर भी इन्हें देख देखकर मेरा मन भरा नहीं है। वैसे तो चिड़ियाघर का अर्थ है, जहां चिड़िया रखी गई हो; परन्तु चिड़ियाघर में केवल अद्भुत पक्षी ही नहीं रखे जाते, अपितु वनों में विचरण करनेवाले पशु, सर्प और नदियों में रहने वाले प्राणी भी रखे जाते है। इसलिए नाम से केवल चिड़ियों का घर होने पर भी चिड़ियाघर सभी विचित्र प्राणियों का संग्रहालय होता है।

अभी कुछ दिन पहले ही हम कई मित्र मिलकर चिडियाघर देखने गए थे। चिड़ियाघर में जाने के लिए बीस रूपये का टिकट था। अन्दर घुसते ही बाई

ओर एक छोटा सा हौज बना हुआ था, जिसके ऊपर लोहे का जंगल लगा था। पानी के अन्दर नेवले जैसे कुछ प्राणी तैर रहे थे। ये ऊदबिलाव थे। यदि पानी में कोई आदमी कोई सिक्का डालता था तो ये डुबकी लगाकर उसे चट से निकाल लाते थे और हौज के अन्दर की ओर बने हुए एक छोटे से आले में रख देते थे।

कुछ थोड़ा और आगे बढ़ने पर बन्दरों के कठघरे थे, जिनमें तरह तरह के बन्दर बैठे थे। इसमें से कुछ बन्दर तो बहुत बड़े बड़े और बदसुरत थे। कुछ छोटे-छोटे और सुन्दर थे। कुछ लंगूर भी थे। लोग इन और बन्दरों के सामने चने डाल रहे थे, जिन्हें वे बड़े चाव से खा रहे थे। बच्चों और बन्दरों में कुछ समानता थी, इसलिए माता-पिता के रोकते-रोकते भी बच्चे बन्दरों को छेड़ देते थे और बदले में बन्दर भी उन्हें घुड़कियां दे रहे थे। 

आगे बढ़ने पर एक बहुत बड़ा बाड़ा दिखाई पड़ा। इस बाड़े के चारों ओर जालियां लगी थी और अन्दर हिरण थे। कुछ हिरन बैठे जुगाली कर रहे थे; कुछ इधर उधर टहल रहे थे; किसी-किसी बाड़े के अंदर बारहसिंगा था, तो कोई चीतल था। किसी के सींग लम्बे लम्बे थे, तो किसी के छोटे छोटे। एक जगह हिरनों के छोटे छोटे बच्चे भी थे, दर्शकों को देखते ही कुलाचे भरते हुए दूर भाग जाते थे। 

आगे दाई ओर को मुड़ने पर एक बड़ा सा चौडा गड्ढ़ा था, जिसके अन्दर दो तीन पेड़ भी खड़े थे गड्ढे की दीवारे ऊंची और सीधी खड़ी थी। इनके ऊपर लोहे के नुकीले सलाखों की बाड़ लगी हुई थी। गड्ढ़े के अन्दर झांककर देखा, तो तीन चार भालू खेल में मस्त थे। भालुओं को इस तरह रखने का यह प्रबन्ध मैने पहली बार देखा था। दूसरे चिड़ियाघर में भालू छोटे छोटे पिंजरों या कठघरों में रखे देखे थे। किन्तु यहां तो भालू खूब खुले उछल कूद कर रहे थे। कभी वे एक दूसरे से कुश्ती लड़ने लगते और कभी पेड के ऊपर चढ़ जाते थे। लोग भालुओं के लिए मूंगफलियां फेक रहे थे। भालू उन्हें छिलके समेत चबाकर खा जाते थे और ऐसी दृष्टि से ताकने लगते थे जैसे और मांग रहे हो। 

थोड़ा और आगे चलने पर छोटी-छोटी जालियों से बने हुए ऊचे कठघरे थे, जिसमें तरह तरह के पक्षी चहचहा रहे थे। एक ओर एक सफेद मोर था। ऐसा मोर मैने पहले कभी नहीं देखा था। लम्बी-लम्बी पूछ वाले विचित्र तोते थे। सुन्दर कबूतर थे। कई छोटा छोटी चिड़िया थी, ऐसी जैसी कि हमने पहले कभी नहीं देखी थी। एक पिंजरे में कोयल थी। एक में कुछ बुलबुलें थी। एक में उल्लू बैठा हुआ था, जिसकी आँखे दिन के प्रकाश के कारण झंपी सी जा रही थी। बाई ओर मडने पर छोटे छोटे कठघरे थे। इनमें से मांस की बदबू आ रही थी। इन कठघरों में भेड़िये, गीदड और लोमड़ियां थी। भेड़िया देखने में मालम कुते से बहुत मिलता जुलता था। गीदड़ देखने में बहुत ही डरपोक लगता था और लोमड़ी की चालाकी उसके चेहरे पर ही लिखी सी जान पड़ती थी। उसने थोड़ा सा आगे एक छोटी सी जगह को जालियों से घेर दिया गया था। उसके अन्दर सफेद खरगोश रखे गए थे। ये खरगोश देखने में बहुत प्यारे मालूम होते थे। वे कभी बैठकर घास कुतरने लगते थे और उछल-उछल कर इधर उधर भागने लगते थे। इन खरगोशों के पास ही एक और जाली में सफेद चूहे रखे हुए थे। ये सफेद चूहे खरगोशों से भी अधिक सुन्दर और प्यारे जान पड़ते थे। 

अब हमे मुड़कर थोड़ी दूर जाना पड़ा। यहां काफी बड़ी जगह को लोहे की ऊची ऊची सलाखों से घेर दिया गया था। उसमें बास के झुरमुट भी थे और जहां-तहां छोटे छोटे कुंड बने हुए थे, जिनमें पानी भरा हुआ थ। यहां कौन सा पश रखा गया होगा, यह देखने के लिए जब हमने निगाह दौड़ाई तो देखा कि बांस के कुंज की छाया में एक विशालकाय बाघ सो रहा था। इससे पहले चिड़ियाघरों मे मैने बाघ कठघरों में ही बन्द देखे थे, परन्तु यहा तो यह ऐसा  दृश्य था जैसे मैं जंगल में ही बाघ को देख रहा हो। इतनी अवश्य था कि लोहे के सीखचों की सुरक्षा होने से यहां भय नहीं लग रहा था। चारों ओर घूमकर देखा तो और दो तीन बाघ उस बनावटी जंगल में विश्राम कर रहे थे। इनमें एक बाघ बिल्कुल सफेद था। कुछ बाघ अपने कठघरे में बैठे थे। ये प्राणी कुछ ऐसे भयंकर होते है कि इनको पिंजरें में बन्द देखकर भी शरीर में एक सिहरन सी दौड़ जाती है। जब कभी वे मुंह फाड़ते है तो देख कर भय भी लगता है। बाघो के पास ही सिहों के पिंजड़े भी थे। सिंह कहने को ही पशुओं का राजा है, पर भयानकता और शक्ति में बाघ से उसकी कोई बराबरी नहीं। गर्दन के बाल उसकी शोभा बढ़ाते है, जिनके कारण वह भयानक न लगकर सुन्दर अधिक लगता है। सिंह के पास ही सिंहनी भी बैठी थी। वह देखने में बाघिन की अपेक्षा निश्चित रूप से अधिक सुन्दर थी। उसके शरीर पर धारिया नहीं थी, किन्तु जब वह हिलती डुलती या चलती थी तो ऐसा प्रतीत होता था जैसे उसका सारा शरीर रबड़ का बना हुआ है। 

इसके आगे के कठघरों में चीते थे। वे लगातार अपने कठघरों में चक्कर लगाए जा रहे थे। इनके शरीर पर चितियाँ पड़ी हुई थी, जिनके कारण इन्हे चीता कहा जाता है। किन्तु पेट के नीचे का भाग एकदम सफेद था। वहा कठघरों में देखने पर ये अत्यन्त सुन्दर प्राणी जान पड़ते थे। परन्तु सुन्दर होने पर भी चीता कितना खतरनाक प्राणी होता है। 

एक ओर कुछ दूर हटकर एक गड्ढ़े में एक बड़े से अजगर सांप को रखा गया था। इस गड्ढे के चारो ओर लोहे की सलाखें इस ढ़ग से और इतने पास-पास लगाई गई थी कि उनमें से होकर अजगर बाहर न निकल सके। हम जितनी देर खड़े रहे, उतनी देर वह कुंडली मारे बैठा रहा, इस लिए उसे चलते हुए देखने का आन्नद हम नहीं पा सके। 

अब हम दाई ओर मुड़कर कुछ दूर निकल गए। यहां हमने एक विचित्र पशु देखा। वह जमीन पर खड़ा खड़ा एक ऊचे वृक्ष की पतियो खा रहा था। उसके शरीर पर विचित्र चित्रकारी हुई थी। उसके सींग छोटे छोटे थे, किन्तु गर्दन इतनी लम्बी थी कि इससे पहले हमने किसी प्राणी की न देखी थी। यह जिराफ था, जो अफ्रीका के जंगलों में पाया जाता है। इसकी गर्दन ऊट से भी लम्बी और पतली थी। ऊचाई की दृष्टि से ऊंट इसके सामने बौना जान पड़ता था। उसके अगले बाडे मे कुछ गधे जैसे प्राणी चर रहे थे। ये जेबरे थें। ये भी अफ्रीका में ही पाए जाते है और घोड़ो और गधे की तरह शाकाहारी पशु है। 

इसी कतार में अगले बाड़े में कंगारू थे। कंगारू आस्ट्रेलिया का एक विचित्र ही पशु है। इसकी अगली टांगे छोटी थी और पिछली टांगे ऊची ऊची थी। सबसे मनोरंजन बात यह थी कि इसके पेट के नीचे एक थैली थी, जिस में यह अपने बच्चे को रख लेता है। इस समय कोई बच्चा उसके पास नहीं था। इसलिए हम बच्चे को इस थैली में बैठे न देख सकें। 

बिलकुल अलग एक ओर हटकर गैडें के लिए बाड़ा बनाया गया था ।यह गैंडा हाल ही में असम के जंगलों से पकड़कर लाया गया था। लोगों को देखते ही वह उतेजित हो उठता था और भागने दौड़ने लगता था। ऐसा पशु प्रकृति में शायद और कोई नहीं है। अब हम लगभग सारा चिड़ियाघर घूम चुके थे। लोटते हुए एक ओर ऊचे ऊचे पिंजड़े जैसे कमरे बने हुए थे। जब उसके पास जाकर देखा, तो अन्दर आदमी से भी ऊंचे ऊंचे पक्षी चलते हुए दिखाई पड़े। पता चला कि यह शुतुरमुर्ग हैं सचमुच ही यह पक्षी देखने में ऊंट से कम नहीं जान पड़ता था। 

अब चिड़ियाघर में देखने को और कुछ शेष नहीं था। मन में एक ही बात बार बार उठती थी कि प्रकृति ने भी कैसें कैसे विचित्र प्राणी संसार में उत्पन्न किए है। चिड़ियाघर को देखकर हम लौट आए, किन्तु उन पशु पक्षियों की छाप मेरे मन पर अब तक भी अमिट बनी हुई है।