जे हरि चरणा राचिया



महाराष्ट्र के संत सोहिरोबानाथ एक बार ग्वालियर गए। उस समय वहाँ के शासक महादजी सिंधिया थे। उन्होंने संत को राजसभा में आने का निमंत्रण दिया। राजा के सेनापति जिवबादादा थे, जो संत सोहिरोबा की विद्वता और ज्ञान से बड़े प्रभावित थे। उन्होंने संत से कहा, “महाराजा एक अच्छे कवि हैं, आप जब उनसे मिलने जाएँ, तो उनकी काव्य-प्रशंसा अवश्य करें।” जिवबादादा ने सोचा था कि आत्मप्रशंसा से खुश हो राजा उन्हें अच्छा इनाम देंगे। संत ने सुना तो चुप रह गए। जिवबादादा को क्या मालूम कि साधु पुरुषों को ऐश्वर्य का कोई आकर्षण नहीं होता।

सोहिरोबा दूसरे दिन जब राजसभा में गए, तो राजा ने काव्य-पाठ किया और उनका अभिप्राय जानना चाहा। सोहिरोबा बोले, “महाराज! बुरा न मानें, आपकी कविता है तो अच्छी, लेकिन मुझे बिलकुल पसंद नहीं आई। मेरी राय में तो जिस रचना में भगवान् का गुणगान नहीं, वह निकृष्ट होती है। वह कविता नीरस और निस्सार होती है, जो भगवद्-रस में डूबी न हो। इसके विपरीत जिस कविता में भगवान् की महिमा गायी होती है, वह उत्तम कोटि की होती है।' इस स्पष्टोक्ति से सारी राजसभा स्तब्ध रह गई, किन्तु राजा को बुरा न लगा और उसने अपनी लेखनी का उपयोग भगवद्-भजन लिखने के लिए करने का निश्चय किया ।