मेरा तो एक साइयाँ
एक बार गजनी के सुल्तान महमूद ने संत अबुल हसन खिरकानी के पास अपना दूत भेजा। उसने उनसे कहा, “बादशाह सलामत गजनी से आपकी जियारत के लिए यहाँ तशरीफ लाए हैं। उनकी दिली ख्वाहिश है कि आप उनके खेमे में पहुँचकर उन्हें दीदार कराएँ।” संत ने जो सुना तो मुसकरा दिए, बोले, “मैं तो अल्लाह के अलावा और किसी को बड़प्पन नहीं देता।”दूत बोला, “बादशाह ने यह भी कहा है कि यदि आप राजी न हों, तो आपको यह आयत सुनाने के लिए कहा है- 'इताअत (आज्ञापालन) करो अल्लाह की और उनकी जो कौमी हाकिम हैं ।"
यह सुनकर हसन बोले, “महमूद से कह दो-मैं अल्लाह की इताअत में ही मसरूफ रहता हूँ। रसूल की इताअत के लिए मेरे पास वक्त नहीं रहता । फिर तुम जैसे दुनियावी हाकिमों के लिए वक्त कहाँ से आए?” महमूद ने सुना, तो बोल उठा, “ये तो पहुँचे हुए दिखाई देते हैं। मैं इनको ऊँचा समझता था, लेकिन ये तो और भी ऊँचे निकले। इसलिए मझे ही उनके दीदार के लिए जाना चाहिए।"










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