लोभ कबहुँ न कीजिए, यामें नरक निदान
बगदाद में फलीज नामक एक बड़े संत हो गए हैं। उनके प्रवचनों को सुनने के लिए लोगों की बड़ी भीड़ रहती थीं बात जब बादशाह हारूँ- अल रशीद के कानों में पहुँची, तो उसने भी संत के दर्शन करने का निश्चय किया। वह संत के पास गया और उनके चरण छूकर उनके पास बैठ गया तथा शांति से प्रवचन सुनने लगा।
प्रवचन समाप्त होने पर उसने संत से धर्मचर्चा की और कुछ प्रश्न भी किए, जिसके उत्तरों से वह संतुष्ट हो गया। लौटते समय बादशाह ने सोचा कि चुपचाप वापस जाना ठीक नहीं। इसलिए उसने उनके चरणों में एक हजार दीनार भरी थैली रखी।
थैली को देखते ही संत का चेहरा उदास हो गया, फिर बोले, “बादशाह ! अभी-अभी मैंने आपको जन्नत का रास्ता बताया था और सोचा था कि आप भी इसी राह चलेंगे, लेकिन ऐसा न करके आप लालच के जरिए मुझे दोजख की राह दिखा रहे हैं। आपकी यह थैली आपको ही मुबारक हो।"










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