माया बत्स जीव अभिमानी



वलीराम नामक एक महान् संत हो गए हैं। वे पहले औरंगजेब के दरबार में दीवान थे। मुकदमों की फाइलें तैयार करना उनका काम था। जब दरबार लगता, तब यह प्रथा थी कि बादशाह के आते ही सारे दरबारी खड़े हो जाते और उनके द्वारा सलाम करने पर बादशाह उनकी ओर नजर फेरकर जब तक बैठने का इशारा न करता, वे बैठते न थे।

एक बार दरबार में बादशाह के आने पर जब सब दरबारी खड़े हुए, तब बादशाह ने वलीराम को बैठने का इशारा नहीं किया। इससे वलीराम के आत्मसम्मान को ठेस पहुँची। उन्हें क्रोध आया और उन्होंने फाइलें वहीं रख दीं तथा वे चुपचाप घर लौट आए। घर आकर उन्होंने घोषणा कर दी कि उन्हें इस संसार से बिलकुल मोह नहीं है, जिन्हें जो चाहिए, वह उनके घर से ले जा सकते हैं। उन्होंने घर का त्याग कर दिया और वे पहने हुए वस्त्रों के साथ यमुना के किनारे जाकर रेत में पैर फैलाकर लेट गए।

इधर जब दरबार में वलीराम न दिखाई दिए, तो बादशाह ने उनके बारे में पूछताछ की। तब दरबारियों ने बताया कि वे दरबार में आए तो थे, किन्तु बादशाह द्वारा उनकी ओर न देखे जाने पर वे फाइलें रखकर घर चले गए। बादशाह ने तब उनके घर उन्हें बुला लाने के लिए सेवकों को भेजा। सेवकों को जब सारी बात मालूम हुई, तो उन्होंने ज्यों-की-त्यों बादशाह को सुना दी।

बादशाह ने सेवकों को यमुना किनारे जाकर वलीराम को ले जाने का आदेश दिया। सेवकों ने जब बादशाह की आज्ञा सुनाई, तो उन्होंने कहा, “जाओ, बादशाह से कह दो कि मैंने घर-संसार का त्याग कर दिया है और अब मैं उनका चाकर न रहा। यदि उन्हें गरज हो, तो वे आकर मुझसे मिल सकते हैं।” यह सुनते ही बादशाह को क्रोध आ गया। वह यमुना-किनारे गया और उसने वलीराम से पूछा, “वलीराम, तुमने अपने पैर कब से फैला लिए?”

वलीराम ने तपाक से उत्तर दिया, "जब से आपने अपने हाथ समेट लिए, जनाब!” वे आगे बोले, “इस संसार मे रहकर मैंने यही सीख ली कि माया ही सबको घमंडी, पापी और दुराचारी बनाती है। इस कारण मैंने उससे दूर रहना उचित समझा और इसलिए मैंने अब उसका त्याग कर दिया।"

वे मस्ती-भरी वाणी में आगे बोले-

चे बंदाए बंदा बूदम व नजरत न नवाखती ।

अक्रने के कदम दरआं बंदा परवर निहादम बदीं दरम ताखती ।

- "जब तक मैं तेरा दास था, तू मेरी ओर आँख उठाकर भी देखता नहीं था। अब मैं ईश्वर का दास बना हूँ और तेरी धन और संपत्ति मैंने छोड़ दी है, तब तू स्वयं चलकर मेरे पास आया है। तेरे इस संसार से मुझे अब क्या लेना-देना?"

बादशाह से कुछ कहते न बना और वह वहाँ से चुपचाप चलता बना ।