अचल अकिंचन सुचि सुखधामा
एक बार हातिमताई से उनके एक मित्र ने प्रश्न किया, "मैं तो आपको ही महान् व्यक्ति समझता हूँ, मगर क्या आपको भी कभी कोई महान् व्यक्ति दिखाई दिया है?"
“हाँ,” हातिमताई ने कहा, “एक बार मैंने सारे नगरवासियों को भोज का आमंत्रण दिया था।” सभी नगरवासी भोज में शामिल हुए। नगर का कोई व्यक्ति बाकी तो नहीं रहा, इस इरादे से जब मैंने शहर का चक्कर लगाया, तो रास्ते में मुझे एक लकड़हारा एक पेड़ काटता दिखाई दिया। मैंने उससे पूछा, "हातिम ने आज सबको भोज का न्योता दिया है। क्या तू वहाँ हो आया है?" उसने जवाब दिया, “नहीं, मैं तो मेहनत की रोटी खाता हूँ। दूसरों की भलाई का बोझ ढोना मैं पसंद नहीं करता।"
इतना कह हातिमताई ने मित्र से कहा, “मित्र! मैं तो उस लकड़हारे को सबसे बड़ा मानता हूँ। दान देकर खुद को बड़ा समझने की बजाय मेहनत की कमाई खाने वाला ही वास्तव में बड़ा होता है।"










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