गुनन पराये देखकर



एक बार संत शिबली संत अबू हफस हदाद के पास सत्संग के लिए गए। उनका भक्ति-भाव देखकर लोग दंग रह गए और उन्होंने उनकी अनुपम शक्ति की भूरि-भूरि प्रशंसा की ।

उस पर अबू हफस बोले, “तुम सब भ्रम में हो, वास्तव में यह बड़ा ढोंगी है। इसके समान कुकर्मी और भगवत् - द्रोही संसार में दूसरा कोई नहीं है।

मैं नहीं चाहता कि यह सत्संग में आए। आप लोग अब इसे सत्संग में न आने दें।” शिबली यह चुपचाप सुन रहे थे। जब उन्होंने महसूस किया कि संत को उनका आना पसंद नहीं है, तो वे वहाँ से निकल गए।

उनके जाने के बाद अबू हफस उपस्थित लोगों से बोले, “ध्यान रखो, किसी की तारीफ उसके मुँह पर नहीं करनी चाहिए। शिबली बेचारा भोला है, मगर वह सच्चा भक्त है, लेकिन तुम लोग उसकी प्रशंसा कर उसका नाश कर रहे थे।

तुम्हारी तारीफ उसके हक में तलवार थी और उसे तुम लोग खींच रहे थे।

अगर उस पर इसका जरा भी असर हो जाए, तो वह अहंकारी और घमंडी हो जाएगा और इससे उसका पतन हो सकता है। उसकी रक्षा के लिए मुझे उसकी निंदा और निरादर की ढाल का काम लेना पड़ा, जिससे उसका खून न होने पाए।"