नासै रोग हरे सब पीड़ा



एक भिक्खु अतिसार से पीड़ित था। वह इस रोग से इतना अशक्त हो गया था कि उससे खुद की देखभाल भी नहीं हो सकती थी। कई जाता और मक्खियाँ उसके शरीर पर भिनभिनाती बार तो वह बेसुध रहतीं। बात जब बुद्धदेव को पता चली, तो वे शिष्य आनंद के साथ उसे देखने उसकी कुटिया में गए। उन्होंने उससे पूछा, “भाई! क्या तुम्हें कोई कष्ट है?"

“हाँ! भगवन्! मुझे अतिसार है।” भिक्खु ने उत्तर दिया । “क्या तुम्हारी कोई परिचर्या नहीं करता?”

“नहीं, भगवन्!”

"इसका क्या कारण है?"

“मैं उनके किसी काम का नहीं हूँ, इसलिए शायद वे मेरी ओर ध्यान न देते होंगे।"

तब तथागत ने आनंद से जल लाने के लिए कहा। उसके द्वारा जल-भरा कलश लाने पर उन्होंने जल से उसका सारा शरीर धोया। फिर उसे ठीक तरह से बिस्तर पर लिटाया और वे वापस लौट गए।

उन्होंने आनंद के द्वारा भिक्खुओं को बुलाया और उनसे पूछा, “क्या विहार में कोई रोगी है?"

“हाँ, भगवन्! है।” एक भिक्खु ने उत्तर दिया।

"उसे क्या कष्ट है?"

“उसे अतिसार है, भगवन्!”

“उसकी देखभाल कौन कर रहा है?"

"कोई नहीं।"

"क्यों?"

“वह किसी दूसरे का काम नहीं करता, इसलिए कोई भी उसके पास नहीं जाता।”

तथागत ने कहा, “भाइयो, तुम्हारा ऐसा सोचना बहुत गलत है। तुम्हारी देखभाल के लिए न तो तुम्हारी माता है, और न पिता । अपनी देखभाल तुम लोग आपस में ही कर सकते हो। अगर तुम लोग ऐसा नहीं करोगे, तो तुम्हारा दुःख-दर्द दूर कैसे होगा? एक-दूसरे की शुश्रूषा करने से ही रोग और पीड़ा नष्ट होंगे। ध्यान रखो, जो मेरी शुश्रूषा और देखभाल करना चाहता है, उसे चाहिए कि वह पहले रोगी भाई की शुश्रूषा करे।"