प्राणिनां देहमाश्रितः



संत ज्ञानेश्वर और उनके भाई-बहिन निवृत्ति, सोपान एवं मुक्ताबाई को बहिष्कृत किया देख एक सज्जन को दया आई और वह उन्हें अपने साथ पैठण ले गया। उन्हें गाँव में आया देख लोग रुष्ट हो गए और उन्हें भला-बुरा कहने लगे। एक पंडित ने ज्ञानदेव की हँसी उड़ाते हुए कहा, “नाम इसका है-ज्ञानदेव ? मगर ज्ञान दो कौड़ी का भी नहीं है।" इससे ज्ञानदेव के स्वाभिमान को ठेस पहुँची। उन्होंने आवेश में कहा, “मेरा ज्ञान क्या पूछते हो? मुझे सारे विश्व का ज्ञान है, विश्व के समस्त रूपों में मैं समाया हुआ हूँ। आपके ही नहीं, हर जीवधारी के रूप में...।” “बस, बस! बस, बस!" पंडित ने उनकी बात काटते हुए कहा, “बड़ा आया है शेखी बघारने वाला। देखता हूँ, किन-किन रूपों में तू समाया है। वह सामने जो भैंसा दिखाई दे रहा है, शायद वह भी तेरा ही रूप है !"

“हाँ, हाँ ! मेरा ही रूप है।” ज्ञानदेव ने उत्तर दिया। तब वह पंडित उस भैंसे के पास गया और उसने उसकी पीठ पर थप्पड़ मारा और ज्ञानदेव की ओर व्यंग्य से देखा। ज्ञानदेव ने तुरंत अपनी पीठ उसकी ओर कर दी, और सब लोग यह देख चकित रह गए कि पंडित की हथेली के निशान उनकी पीठ पर उभर आए थे।

किन्तु पंडित पर इसका कोई असर न हुआ। वह बोला, “इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। यह तो जादू से भी हो सकता है। यदि तुम इस भैंसे के मुँह से वेदमंत्र सुनवाओ, तो जानूँगा कि तुममें भी ज्ञान है ।"

तब ज्ञानदेव भैंसे के पास गए और उसकी पीठ पर हाथ फेरकर उन्होंने कहा, "इस पंडित की आज्ञा का पालन करो।” ज्योंही उन्होंने ऐसा कहा, भैंसे ने गंभीर मानवी वाणी में कहना शुरू किया-अग्निमीळे पुरोहितम् यज्ञस्य देवमृत्विजं होतारं रत्नधातजम्... ।

यह देखते ही उपस्थित जन और भी आश्चर्यचकित रह गए। वह पंडित और अन्य शास्त्री ज्ञानदेव के चरणों पर गिर पड़े और उन्होंने कहा, “ज्ञानदेव! मान गए। तुम साक्षात् भगवान् हो। तुम जगत् का अवश्य कल्याण करोगे ।"