असुवन जलसींचि-सींचि
एक बार हजरत मुहम्मद के पंद्रह महीने के बच्चे का देहावसान हो गया। हजरत को बेहद दुःख हुआ और वे उसकी लाश पर झुककर विलाप करने लगे। यह देख उनके एक सेवक अब्दुर्रहमान ने उनसे कहा, “आपने हमें तो शोक करने की मनाही की है। मगर आज तो आप खुद ही शोक कर रहे हैं!"
हजरत ने जवाब दिया, “हमने चिल्लाने-चीखने, सिर कूटने और कपड़े फाड़ने की मनाही की है, क्योंकि यह शैतान का काम है। हमने रोने से मनाही नहीं की है। आँसू करुणा के चिह्न हैं और रोने या विलाप करने से वे आँखों से निकल आते हैं। आँसू हमारे दिल के घाव पर खुशबूदार मरहम का काम कर हमारे शोक को दूर करने में सहायक होते हैं। मनुष्य सत्य और शांति से तब तक दूर है, जब तक करुणा-रस में उसका हृदय पगा नहीं है। यह ऐसा द्रव्य है, जो देने से बढ़ता है और हमारे जीवन को सार्थक बनाने का काम करता है। इसलिए आँसुओं को रोकना नहीं चाहिए।"










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