ज्ञानी तो नीडर भया
गुरु गोविंदसिंहजी ने जब आनंदपुर छोड़ा, तो बराड़ कौम का एक सरदार - डल्ला उनके पास आकर बोला, “गुरुसाहिब! आपने मुझे खबर दी होती, तो मैं आपकी मदद करता।” गोविंदसिंहजी ने कहा, “जैसा मालिक का हुक्म था, वैसा हुआ ।"
इतने में एक सिक्ख वहाँ आया और उनके चरणों पर गिरकर उन्हें अपनी एक बंदूक भेंट की। तब गुरु साहिब ने डल्ला से कहा, “डल्ला, मैं, इस बंदूक की आजमाइश करना चाहता हूँ, कोई ऐसा व्यक्ति बतला, जिस पर में इसकी आजमाइश करूँ।” डल्ला बोला, “मैं कैसे बता सकता हूँ साहिब?” “हाँ, बात तो ठीक कहते हो,” गुरुसाहिब ने कहा, “यदि तुम्हीं पर इसकी आजमाइश करें, तो कैसा रहेगा?"
यह सुनते ही डल्ला को पसीना आ गया, बोला, “मगर मेरे तो छोटे-छोटे बच्चे हैं। मेरे बाद उनका क्या होगा?" गोविंदसिंहजी ने कहा, "मगर अभी-अभी तो तू कह रहा था कि तुझे खबर करता, तो तू मेरी मदद करता। क्या यही तेरी बहादुरी है?" डल्ला से कोई जवाब न देते बना। तब वे उससे बोले, "अच्छा! मेरे तबेले में जाकर कह कि मुझे इस बंदूक की आजमाइश करनी है, इसलिए कोई सेवक यहाँ आए।"
सेवकों ने आदेश सुना, तो सभी उनके पास आए और हर एक ने खुद पर आजमाइश करने की इच्छा व्यक्त की। तब गुरुसाहिब डल्ला से बोले, “देखा, मेरे सारे-के-सारे शिष्य बहादुर हैं। इनके रहते भला मुझे किसी मदद की क्या जरूरत? मैं तो तेरा इम्तहान ले रहा था कि तेरे कथन में कितनी सच्चाई है।" यह सुनते ही डल्ला ने माफी माँग ली।










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