अन्त्यज के जलकुंभ में
राजा पीपा को एक बार सत्संग की इच्छा हुई। उसने अपने वजीर से किसी अच्छे महात्मा के बारे में पूछताछ की। वजीर ने उसे संत रविदास का नाम बताया और यह भी कहा कि वे जाति के चमार हैं। यह सुन राजा सोचने लगा कि यदि लोगों ने सुना कि वह एक चमार के पास गया था, तो लोग उसका धिक्कार करेंगे, इसलिए अकेले ही जाना उचित है और वहाँ से आकर स्नान किया जा सकता है।
एक दिन राजा संध्या समय चुपके से संत रविदास की झोंपड़ी में गया और उनसे उपदेश देने की प्रार्थना की। संत रविदास उस समय जूते सी रहे थे। उन्होंने पास के डोल का पानी राजा की अंजलि में देते हुए कहा, “पहले आप चरणामृत ग्रहण करें।” यह सुनते ही राजा के मन में विचार उठा कि यह तो जाति का चमार है अतः चरणामृत कैसे लिया जा सकता है, पर इनकार भी नहीं किया जा सकता। उसने चरणामृत ले तो लिया किन्तु संत की आँख बचाकर अपने कुरते की खुली आस्तीन में डाल दिया। संत से यह बात भला कैसे छिप सकती थी, तथापि वे चुप रहे। उन्होंने राजा से बाद में आने के लिए कहा।
वापस आते समय राजा खुश था कि उसने कितनी चालाकी से एक अस्पृश्य का जल ग्रहण करने से अपनी रक्षा कर ली थी। उसने तुरंत कुरता निकालकर उसे धोने के लिए धोबी को दे दिया।
धोबी जब कुरते को धोने लगा कि अचानक उसकी 10 वर्ष की बालिका वहाँ आई और उसने वह कुरता छीनकर आस्तीन वाला भाग चूस डाला। ज्यों-ही उसने वह कुरता वापिस किया कि उसने धर्मोपदेश देना शुरू कर दिया। घाट के सारे धोबी वहाँ इकट्ठे हो गए और उसके धर्मोपदेश को सुन विस्मित रह गए। फिर तो अन्य लोगों की वहाँ अच्छी-खासी भीड़ जम गई।
थोड़ी ही देर में बात पीपा तक जा पहुँची कि धोबी की कन्या- धर्मोपदेश देती है। उसके मन में उत्कंठा हुई और वह धोबी के घर गया। राजा को आया देख वह कन्या उठ खड़ी हुई। तब राजा ने उसे बैठने के लिए कहा। कन्या बोली, “राजन्! मैं आपको सम्मान देने के लिए खड़ी नहीं हुई, मैं तो आपको धन्यवाद देना चाहती हूँ कि मुझे जो उपलब्धि हुई है, वह आपकी ही कृपा से हुई है।" राजा की कुछ समझ में नहीं आया। तब अपने कथन को स्पष्ट करते हुए उसने कहा, “यदि आपने संत रविदास द्वारा दिए गए चरणामृत को अपने आस्तीन न डाला होता और उस आस्तीन को मैंने न चूसा होता, तो मुझे यह ज्ञान प्राप्त न होता।” राजा ने जो सुना, तो उसे पश्चात्ताप हुआ और वह तुरंत संत रविदास की कुटिया में गया। वह उनके चरणों पर गिर पड़ा और उसने उनसे माफी माँगी। संत ने कहा, “राजन्! मैं तो आपको अमृत देना चाहता था, किन्तु वह आपके भाग्य में नहीं था, अन्यथा वह एक धोबी की कन्या के मुख में कैसे जाता और उसे कैसे ज्ञान की प्राप्ति होती?”










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