संगति
संत जलालुद्दीन एक बार बादशाह से मिलने उसके महल में गए। बात जब उनके शिष्यों को मालूम हुई, तो उन्हें बड़ा दुःख हुआ क्योंकि उन्होंने कुरान में पढ़ा था कि फकीर को राजा या अमीर के महल में नहीं जाना चाहिए ।
संत के वापस आने पर एक शिष्य ने उनसे कहा, "हमने कुरान में पढ़ा है कि फकीर को महल में नहीं जाना चाहिए, मगर आप इस नियम का उल्लंघन कर वहाँ गए। बादशाह को जरूरत थी, तो वह खुद आ सकता था।"
जलालुद्दीन ने कहा, “तुम क्यों माथापच्ची कर रहे हो। मैं उसके पास जाऊँ, या वह मेरे पास आए, बात एक ही है। वही मेरे पास आया था, ऐसा क्यों नहीं सोचते?" संत ने आगे कहा, “बादशाह को मेरे पास आने की फुरसत ही कहाँ है, अज्ञानी जो ठहरा! और मैं चाहता हूँ कि मुझसे जितना भी बन पड़े, उसकी संगति करूँ। मैं उसके पास जाऊँगा, तो वह भी मेरे पास आने की कोशिश करेगा। मैं उसके पास कुछ माँगने के लिए तो गया नहीं था।
मैं तो उसे देने गया था और वह चीज थी- नसीहत, जिससे कि उसके जीवन में तबदीली आए और वह सदाचारी, सहिष्णु, सहृदय बने। वह हमेशा अपने दरबारियों से घिरा रहता है और मैं चाहता था कि भले ही कुछ क्षणों के लिए क्यों न हो, वह उनसे दूर रहे और अपने मन के मुताबिक काम करे।
रही बात कुरान के नियम की, तो उस आयत का मतलब यह है। कि फकीर को अमीर के पास इसलिए नहीं जाना चाहिए कि वह वहाँ के ऐशो-आराम की चीजों को देख लोभ और मोह में न पड़े। फकीर की संगति तो उसे नेकी की राह दिखा सकती है।"










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