महात्मा व्यासदास
ओरछानरेश मधुकरशाह महात्मा व्यासदास से बड़े प्रभावित थे और उन्हें राजगुरु -पद पर प्रतिष्ठित किया। किन्तु वीतरागी संत का मन भला राजवैभव में कैसे रमता? वे एक दिन वृंदावन जा पहुँचे और संत हितहरिवंश से दीक्षा लेकर वहीं वास करने लगे। बात जब नरेश को मालूम हुई, तो उन्हें बड़ा दुःख हुआ। उन्हें वापस लाने के लिए उन्होंने मंत्री को वृंदावन भेजा। मंत्री ने संत हित हरिवंश को सारी बातें बताईं और व्यासदास को वापस ले जाने की उनसे आज्ञा भी प्राप्त कर ली। यह बात जब व्यासदासजी को मालूम हुई, तो उन्हें बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने अपने मुख पर कालिख पोत ली और एक गधे पर बैठकर वे गुरु के पास गए।
गुरु ने जब देखा, तो पूछा, “यह क्या स्वाँग रचा रखा है तुमने?” व्यासदास ने उत्तर दिया, “मैंने जिन चरणों का आश्रय लिया है, वे ही जब मुझे वृंदावन से बाहर भेज रहे हैं, तो मैंने सोचा कि अपना मुँह काला कर और गधे की सवारी करके क्यों न राजवैभव का भोग लेने वापस जाऊँ ?” गुरु ने उनकी दृढ़ इच्छा देखकर मंत्री से अनिच्छा व्यक्त की।
किन्तु राजा को एक संत पुरुष का अपने राज्य से चले जाने का बड़ा दुःख हो रहा था, अतः वे स्वयं वृंदावन जा पहुँचे और उन्होंने व्यासदासजी से वापस चलने की न केवल प्रार्थना की, बल्कि उनके अस्वीकार करने पर उन्हें पालकी में बिठाकर ले जाना चाहा। तब उनके मुख से यह शब्द निकल पड़े-
मोसों पतित न अनत समाई ।
याही ते मैं श्रीवृंदावन की सरन गह्यो है आई।
अब राजा को भी विश्वास हो गया कि संत ओरछा में एक पल भी नहीं रह सकते। उन्होंने संत को अपने साथ ले जाने का विचार त्याग दिया और उनसे क्षमा माँगी।










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