जाकी रही भावना जैसी 



सुल्तान नासिरुद्दीन की उसके एक दोस्त से कई वर्षों के बाद मुलाकात हुई। वह उसके गले मिला, पर उसके खराब वस्त्र देख उसके मन में करुणा जागी और उसने अपने लिए सिले कपड़े उसे पहनने को दिए। ये कपड़े उसने अपने लिए सिलाए तो थे, मगर उन्हें कीमती जान वह पहनने में हिचकिचाता था और उसने उन्हें कभी पहना ही न था ।

भोजन करने के बाद नासिरुद्दीन मित्र से बोला, “चलो, मैं तुम्हें अपने मित्रों से परिचय कराता हूँ।" रास्ते में मित्र के शरीर पर अपने कीमती कपड़े देख नासिरुद्दीन सोचने लगा-यह तो बिलकुल अमीर जान पड़ता है और मैं उसका एक नौकर। मगर कपड़े तो अब वापस लिए नहीं जा सकते।

इतने में उसके एक मित्र का घर दिखाई दिया। वे दोनों अंदर गए। नासिरुद्दीन जब मित्र से उसका परिचय कराने लगा, तो उसका ध्यान वस्त्रों की ओर गया और वह बोला, “यह मेरा बरसों पुराना दोस्त है। इसने जो कपड़े पहने हैं, वे मेरे ही हैं।"

दोस्त ने जब सुना, तो उसे बुरा लगा। उसने उस समय तो कुछ नहीं कहा, मगर रास्ते में उसने कहा, “आपको यह नहीं कहना था कि ये आपके कपड़े हैं।”

“ठीक है! अब मैं ऐसा नहीं कहूँगा,” नासिरुद्दीन ने जवाब दिया। मगर रास्ते में जब एक परिचित से मुलाकात हुई, तो अपने दोस्त का परिचय कराते समय कपड़ों की ओर ध्यान गया, और उसके मुँह से निकल पड़ा, “इन्होंने ये जो कपड़े पहने हैं, वे मेरे नहीं, इन्हीं के हैं।"

दोस्त को फिर बुरा लगा और उसने रास्ते में कहा, “आपको मेरे कपड़े नहीं हैं - ऐसा नहीं कहना था।” नासिरुद्दीन ने अफसोस जाहिर करते हुए कहा, “मेरी जबान धोखा खा गई।”

उसने निश्चय किया कि अब वह कपड़ों का जिक्र ही नहीं करेगा, मगर उसके अंतर्चक्षुओं को तो वे कपड़े ही दिखाई दे रहे थे, इसलिए तीसरे मित्र से मुलाकात होने पर उनके मुँह से निकल पड़ा, “ये मेरे घनिष्ट दोस्त हैं, बीस वर्ष बाद आए हैं।

बड़े अच्छे हैं, मगर मैं यह नहीं बताऊँगा कि इन्होंने जो कपड़े पहने हैं, वे मेरे हैं या इनके ।"

अब दोस्त से न रहा गया। उसे गुस्सा आया और उसने वापस लौटकर कपड़े वापस कर दिए और चलता बना।

नासिरुद्दीन को बड़ा पश्चाताप हुआ, किन्तु वास्तविकता यह कि नासिरुद्दीन के निःस्पृह और निर्लोभी होते हुए भी चंचल मन के आगे उसकी एक न चली। मन में दबी हुई बात किसी-न-किसी रूप में प्रकट हो जाती थी।