तन को जोगी सब करें
माता के कहने पर राजा गोपीचंद ने राजपाट का त्याग किया और वह गुरु गोरखनाथ का शिष्य हो गया। पहले ही दिन गोरखनाथ ने उसे भिक्षा लाने के लिए कहा। राजा जब लोगों के पास गया, तो उसे 'राजा' जान उन्होंने मुक्तहस्त से सिक्के और आभूषण दिए। राजा ने सोचा कि माँ से भी कुछ भिक्षा मिल सकती है, अतः जब वह माता के पास गया, तो उसने कहा, “ध्यान रख, मैं एक गृहस्थ स्त्री हूँ और तू एक योगी पुरुष। मैं तुझे जो भी भिक्षा दूँगी, वह तेरे पास हमेशा के लिए नहीं रह सकती। फिर भी तू मेरे द्वार पर याचक बनकर आया है, इसलिए मैं तुझे तीन बातें दे रही हूँ, तू उन्हें उपदेश मानकर ग्रहण कर। पहली बात यह कि रात को मजबूत किले में रहना; दूसरे, स्वादिष्ट भोजन ही ग्रहण करना और तीसरे, नर्म-मुलायम बिस्तर पर पड़े रहना।"
गोपीचंद ने सुना तो हैरान रह गया, बोला, “माँ, मैं तो तेरे उपदेश से साधु बना था और अब तू ही मुझे ऐसा उपदेश दे रही है, मानो तू एक साधु को नहीं, बल्कि राजा को दे रही है।"
माता बोली, “योगी, तूने मेरी बातों को गलत समझा। 'मजबूत किले में रहने' का अर्थ है-राजा समान भोग-विलास में न पड़कर अपने गुरु की संगति में रहना। गुरु की संगति से बढ़कर मजबूत किला कोई नहीं है। ऐसे मजबूत किले में रहने से तेरे मन में जरा भी कुविचार नहीं उठेंगे। दूसरी बात का आशय यह है कि थोड़ा ही खाना और भूखे रहना। तू जो भी रूखा-सूखा खाएगा, वही तेरे लिए स्वादिष्ट रहेगा और तीसरी बात कि 'नर्म-मुलायम बिस्तर पर सोना'-इसका मतलब यह है कि तुझे दिन-रात जागते रहना चाहिए। जहाँ भी नींद आए, उसी जगह पर सो जाना, फिर वहाँ कंकड़ और पत्थर क्यों न हों। नींद आने पर ये तेरे लिए नर्म-मुलायम बिस्तर के ही समान होंगे और तेरी नींद में ये जरा भी बाधक न होंगे।"










0 Comments