खुदा की बस्ती दुकां नहीं है
संत इब्राहीम फकीर बनने के बाद शहर से दूर एक झोंपड़ी बनाकर रहने लगे। लोग जब वहाँ से जाते, तो उनसे बस्ती का रास्ता पूछते। वे सामने की ओर इशारा कर देते। जब कोई पूछता, “क्या यह दूसरा रास्ता बस्ती की ओर नहीं जाता?" तो वे कहते, "नहीं, यह नहीं जाता।” लेकिन वे लोग जब उनके बताए रास्ते से आगे बढ़ते, तो श्मशान में पहुँच जाते। आखिर लौटकर मन-ही-मन संत को कोसते हुए दूसरे रास्ते से आगे बढ़ जाते।
लेकिन एक दिन एक मुसाफिर को गुस्सा आ गया और उसने लौटकर संत को बुरा-भला कहना शुरू किया। तब इब्राहीम उससे शांत भाव से बोले, “अरे भाई, मरघट क्या बस्ती नहीं है? तुम जिसे 'बस्ती' कहते हो, वहाँ रोज एक-न-एक मौत होती रहती है, तब वह घर क्या उजड़ नहीं जाता? उन उजड़े घरों से ही तो मरघट में बस्ती बन गई है। लेकिन इस बस्ती में जो एक बार बस गया, वह हमेशा के लिए वहाँ बस जाता है। उसे वहाँ से हटने की जरूरत नहीं होती। इसलिए क्या यह बस्ती नहीं हुई? मैंने इसीलिए तुम्हें बस्ती का रास्ता बताया था, लेकिन तुम बुरा मान गए।" यह सुन मुसाफिर चुप गया और बिना कुछ बोले वह दूसरे रास्ते से आगे बढ़ गया।










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