वचनहुँ यह गजत यों



महाराष्ट्र के संतद्वय तुकाराम और संताजी समकालीन थे। इन दोनों में हमेशा सत्संग होता रहता। एक बार चर्चा के दौरान उन्होंने तय किया कि जिसकी भी पहले मृत्यु होगी, दूसरा उसकी अंत्येष्टि-क्रिया के समय उपस्थित रहेगा और मृत देह को मिट्टी अर्पित करेगा।

दैव का विधान कि संत तुकाराम का निर्वाण पहले हुआ और उन्हें लेने के लिए वैकुंठ से विमान आ गया। इस अवसर पर भक्त समुदाय एकत्र हुआ, जिसमें संताजी भी थे, किन्तु तुकाराम विमान में बैठे और वह देखते-देखते आँखों से ओझल हो गया।

इस घटना के कुछ वर्ष बाद संताजी का स्वर्गवास हुआ। तब उनकी अंत्येष्टि के लिए तेली समुदाय और वारकरी पंथ के लोग एकत्र हुए। मृतक संताजी का मुख बंद था। तेली समाज की विधि के अनुसार जब उनके मुख में उनके पुत्र द्वारा ग्रास भर मिट्टी डाली जाने लगी, तो लोग यह देख हैरान हो गए कि मुख खुल ही नहीं रहा है। काफी प्रयास करने के बाद भी मुख न खुला, तो उनके सगे-संबंधी शोक करने लगे कि क्रिया-कर्म में कोई खोट तो नहीं आ गई है, अथवा संताजी की कोई इच्छा अतृप्त तो नहीं रह गई है। अकस्मात् लोगों को एकत्र समुदाय में संत तुकाराम दिखाई दिए। वे शव के पास आए और उन्होंने संताजी का मुख खोलकर तीन मुट्ठी मिट्टी डाली। इसी समय उन्होंने संताजी के पुत्र को तेरह अभंग दिए, जिनमें से एक की निम्न तीन पंक्तियों में उपर्युक्त घटना का उल्लेख है-

आम्हां येणे झाले । एका तेलिया कारणें । 

तीन मुष्टि मृतिका देख । तेव्हां लोपविले मुख । 

आलो म्हणे तुका । संत न्यावया विष्णु लोका ।