राम सरिस कोउ नाहीं
एक बार गोस्वामी तुलसीदास संत नाभादास से सत्संग करने वृंदावन गए। तब उन्हें यह देख बड़ा दुःख हुआ कि यत्र-तत्र कृष्ण का ही भजन-पूजन हो रहा है और उनके आराध्यदेव रामचंद्रजी का नाम कहीं सुनाई ही नहीं दे रहा है।
तब उनके मुख से ये शब्द फूट पड़े-
राधा-कृष्ण सबै कहैं, आक ठाक अरु कैर ।
तुलसी का ब्रज मों कहा, सियाराम सों बैर ।।
उनके मन-मंदिर में तो प्रभु रामचंद्र की ही मन मोहक मूर्ति विराजमान थी, अतः वे जब गोपाल मंदिर पहुँचे और वहाँ भी जब उन्हें करुणानिधान राम की मूर्ति न दिखाई दी, तो उन्होंने संकल्प किया कि जब तक राघवेंद्र की मूर्ति दिखाई नहीं देगी, वे अपना माथा नहीं नवाएँगे और आँख बंद कर उन्होंने निम्न दोहा कहा-
कहा- कहौं छबि आज की, भले बने हो नाथ ।
तुलसी मस्तक तब नवै, धनुष-बाण लो हाथ ॥
और दीनदयालु श्रीकृष्ण को उनके संकल्प के आगे झुकना पड़ा। उन्होंने ज्योंही आँखें खोलीं, सामने रघुकुल-तिलक श्रीराम की प्रतिमा दिखाई दी और तब उन्होंने दंडवत् प्रणाम किया।
महाराष्ट्रकवि मोरोपंत (मयूर कवि) ने 'केकावलि' में उपर्युक्त घटना का इस प्रकार वर्णन किया है-
श्रीकृष्णमूर्ति जेणें केली, श्रीराममूर्ति सज्जन हो ।
रामसुत मयूर म्हणें त्याचा सुयशामृतांत मज्जन हो ॥










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