मान-अपमान न चित धरै



एक बार जब वर्षा न हुई, तो किसान चिंतित हो गए। तभी किसी व्यक्ति ने बताय कि समीप के खडूर-खहरयाँ ग्राम में तपा नामक एक योगी रहता है, जो बारिश ला सकता है। तब कुछ लोग उसके पास गए और उन्होंने उससे योग-विद्या से बारिश कराने की विनती की। उसी गाँव में सिख गुरु अंगददेव का भी डेरा था। तपा उनसे बेहद ईर्ष्या करता था ।

उसने गुरु को तंग करने का अच्छा मौका जान कहा, “तुम्हारे गाँव में अंगद नाम का कोई दाढ़ी धारी साधु आया है। वह जब तक गाँव में रहेगा, वर्षा न होगी।" लोगों को अंगददेव के प्रति अपार श्रद्धा थी, तथापि योगी की बात को सत्य मान उन्होंने अंगददेव से सारी बात कहकर नम्रतापूर्वक डेरा हटाने की प्रार्थना की। गुरुदेव ने कहा कि यदि उनके जाने से बारिश होती है, तो जाने में हर्ज ही क्या और वे चुपचाप दूसरे गाँव चले गए।

किन्तु उनके जाने के बाद भी जब वर्षा न हुई, तो लोगों को गुस्सा आया और वे तपा को तंग करने लगे कि बारिश क्यों नहीं हो रही है। उसने मंत्र-तंत्र का काफी सहारा लिया, किन्तु फिर भी बारिश न हुई, तब लोगों ने उसे बुरा-भला कहा और वापस चले आए।

गुरु अमरदासजी इस बात से अनभिज्ञ थे। वे जब अंगददेव से मिलने गाँव में आए, तो लोगों ने सारी हकीकत बताई ।

यह सुन अमरदासजी को क्रोध आया और उन्होंने लोगों से कहा कि योगी को उस स्थान से हटाओ और जहाँ-जहाँ बारिश चाहते हो, उसे ले जाओ, बारिश होगी। और लोगों को यह देख प्रसन्नता की सीमा न रही कि वे जिस-जिस खेत में तपा को खींचकर ले गए, वहाँ अच्छी तरह बारिश हुई।

बात जब अंगददेव को पता चली, तो उन्हें दुःख हआ और उन्होंने अमरदासजी से कहा, “यदि कोई बुराई करता है, तो हमें नजर अंदाज कर देना चाहिए।

करामात और करतब दिखाकर भीड़ जमा करना भी अच्छा नहीं है । चमत्कारों और आडंबरों से तो हमें कोसों दूर रहना चाहिए। महात्मा लोग तो मालिक की रजा में ही राजी होते हैं, इसलिए हमें मान-अपमान की परवाह न कर सबके साथ सद्व्यवहार करना चाहिए।"