एक परमात्मा, एक तू



एक बार मस्जिद में नमाज अदा करने के बाद मुहम्मद साहब ने इमामों और उपस्थित लोगों से पूछा, “आपके पास क्या है?" हजरत उमर ने जवाब दिया, “मेरी बीवी है, बेटे-बेटियाँ हैं, ऊँट हैं और भी काफी सामान असबाब है।"

इसी प्रकार दूसरों ने भी अपनी-अपनी मिल्कीयत की चीजें गिना दीं। जब हजरत अली की बारी आई, तो वे बोले, "मेरा अपना कहने लायक तो केवल एक खुदा है और एक तू है। इनके अलावा और कोई नहीं, जिन्हें मैं 'अपना' कह सकूँ।"

यह सुन मुहम्मद साहब बोले, “अली की बात बिलकुल सही है। दुनिया में ऐसी कोई भी चीज नहीं, जिसे हम 'अपना' कह सकें, क्योंकि बुरे दिन आने पर 'अपना' कहलाने वाले सभी लोग साये की तरह भाग जाते हैं।

दुनियादारी में जो ज्यादा देर फँसा रहता है, वह खुदा से बहुत दूर चला जाता है, और जो केवल खुदा पर भरोसा करता है और उसी से प्यार करता है, खुदा उसे हरदम अपने पास रखता है।"