यद् भाव्यं तद् भविष्यति
एक बार गोस्वामी तुलसीदासजी मंदिर की ओर जा रहे थे कि मार्ग एक ब्राह्मण स्त्री मिली। तुलसीदासजी को देख उसने प्रणाम किया। तब उन्होंने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा, “सौभाग्यवती भव!” इस पर स्त्री की आँखों में आँसू आ गए और वह दुःखित अंतःकरण से बोली, "महाराज! आपने यह क्या आशीर्वाद दे दिया? मेरे पति का आज ही निधन हुआ है और मैं सती हो जाने वाली हूँ।”
तुलसीदासजी ने सुना, तो उन्हें बेहद दुःख हुआ कि उन्होंने अनजाने में एक विधवा को सधवा होने का आशीर्वाद दे दिया है। उन्होंने मन-ही-मन • अपने आराध्य देव से प्रार्थना की कि वे उनके आशीर्वाद को वृथा न जाने दें। करुणामूर्ति प्रभु रामचंद्रजी ने उनकी प्रार्थना सुन ली ।
वह स्त्री जब घर गई तो उसने देखा कि उसके पति को जीवनदान मिल गया है। उसने जान लिया कि यह गोसाईंजी की ही कृपा है। उसे विश्वास हो गया कि संत और साधु पुरुषों के वचन कभी असत्य नहीं होते।










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