शीलवंत सबसे बड़ा



एक बार महर्षि बोधायन शिष्यों के अनुरोध पर आश्रम से दूर, नदी के तट पर गए। गुरु-शिष्य मछलियों की तरह घंटों तक जलविहार करते रहे। बाद में भोजन के बाद अपने-अपने उत्तरीय फैलाकर वे लेट गए। शीघ्र ही निद्रा देवी सबको सम्मोहावस्था में पहुँचा दिया। प्रातः तड़के जब महर्षि की निद्रा भंग हुई तो वे उठे और उन्होंने समीप ही वृक्ष के पास सोये अपने प्रिय शिष्य गार्ग्य को जगाना चाहा। वे जब उसके पास गए, तो उन्होंने देखा कि गार्ग्य जाग रहा है और उसके पैरों से लिपटकर एक महासर्प सोया पड़ा है।

गार्ग्य ने धीरे-से कहा, “गुरुजी ! आप चिंता न करें। जब सर्प नींद पूरी हो जाएगी, तो वह स्वयं चला जाएगा; उसकी निद्रा भंग न करें।” हुआ भी ऐसा ही। घंटा भर बाद सर्प जागा और गार्ग्य के पैरों से अलग हो चुपचाप अपने बिल में प्रविष्ट हो गया ।

यह देख महर्षि बड़े प्रसन्न हुए और गार्ग्य को अंक में भरकर उन्हें आशीर्वाद दिया, "वत्स, तुम्हारी यह शील-संपदा अक्षय रहे।" एक शिष्य मैत्रायण ने जब यह सुना, तो चकित हो वह बोला, “भगवन्! गार्ग्य ने अदम्य साहस का परिचय दिया है, शील का नहीं।" महर्षि मुसकराकर बोले, "वत्स, जल का ही तो घनीभूत रूप हिम है। इसी तरह शील का वह घनीभूत रूप, जो विकट विषमताओं और विपरीतताओं के बीच भी अपने स्वरूप को अक्षुण्य बनाए रखता है, साहस है। इसलिए महिमा उसके शील की ही है।"