हिंदू - तुरुक भेद कछु नाहीं
प्रयाग में स्वामी प्रपन्नाचार्य नामक एक महान् संत हो गए हैं। उनकी त्याग-वृत्ति तथा पांडित्य से लोग बड़े प्रभावित थे। प्रयाग में जब माघ का मेला लगता, तब वे शिविर लगाते और मध्याह्न के समय भगवान् को भोग लगाकर उपस्थित लोगों में प्रसाद बाँटते। यह काम उनके प्रिय शिष्य गोविंदजी, जो आगे चलकर परमार्थभूषण गोविंदाचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुए, के द्वारा किया जाता था ।
एक बार गोविंदजी प्रसाद का वितरण कर रहे थे कि स्वामीजी को बाहर कोलाहल सुनाई दिया। उन्होंने गोविंदजी को बुलाकर कोलाहल का कारण पूछा। गोविंदजी ने कहा, “महाराज! एक मियाँ आइ गवा रहा । ओही से बतियाव हुई गवा।"
"काहे ?" स्वामीजी ने आश्चर्य से पूछा ।
"महाराज! ऊ परशाद माँगत रहा!" "तो ओह का परशाद दिया की नाहीं ?" “नाहीं महाराज!”
“काहे ?”
"महाराज! ऊ जो मुसलमान रहा।”
यह सुनते ही महाराज को पश्चाताप हुआ। वे बोले, “गोविंद ! हम तुमका गीता नहीं पढ़ावा ? गीता मां भगवान् कहिन है- 'अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।' तब तू ओह में बिराजमान वैश्वानररूपी नारायण का भोजन करे तेऊं कि मुसलमान का? एही तुम गीता समझे हो? भोजन तो नारायण कां जात है-ना हिंदू कां, न मुसलमान का! परशाद देत मां कोई भेद ना करो ! जावं ओह का परशाद देऊ आवा।”
गोविंदजी जब दरवाजे पर गए, तो उन्हें वह व्यक्ति चला गया था। गोविंदजी उसे ढूँढ़कर ले आए और उससे क्षमा माँगकर उन्होंने उसे पेट भर भोजन कराया।










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