जहाँ दया तहँ धर्म है 



मुहम्मद गजनी का पिता सुबुक्तगीं पहले अलप्तगीं बादशाह का गुलाम था। वह हमेशा अपने टट्टू पर सवार हो शिकार के लिए निकलता था। एक बार रास्ते में उसे एक हिरनी के साथ उसका बच्चा दिखाई दिया। उसने बच्चे को पकड़ कर उसकी टाँगें रस्सी से बाँधी और उसे टट्टू पर रखकर वह घर की ओर लौटने लगा। अकस्मात् उसे ऐसा महसूस हुआ कि पीछे से कोई दौड़े आ रहा है। उसने जब मुड़कर देखा, तो उसे हिरनी आती दिखाई दी, जिसकी आँखों में आँसू जमा हो गए थे। वह करुण नेत्रों से अपने बच्चे की ओर देखती चली आ रही है। यह दृश्य देख सुबुक्तगीं के हृदय में भी करुणा जाग्रत हो उठी। उसने तुरंत बच्चे को रस्सी से मुक्त कर दिया। बच्चे को मुक्त देख हिरनी फौरन उसके पास गई, मगर उसकी आँखें अब भी सुबुक्तगीं पर गड़ी हुई थीं कि कहीं वह बच्चे को फिर से न छीन ले। सुबुक्तगीं ने उसकी आँखों का भाव पहचान लिया और वह वहाँ से चुपचाप चलता बना।

रात को सुबुक्तगीं को स्वप्न में पैगम्बर साहब के दर्शन हुए। उन्होंने उससे कहा, “तूने दया करके एक असहाय और मूक प्राणी को मुक्त किया है। इसे खुदा ने बहुत पसंद किया है और उसने तेरा नाम बादशाहों की फेहरिस्त में लिखवा दिया है। वह तुझसे यही उम्मीद करता है कि आगे भी तू यही बरताव अपनी रैयत के साथ भी करेगा ।"