जे रहीम उत्तम प्रकृति



एक बार जहाँगीर बादशाह को राजमहल से थोड़ी दूरी पर एक झोंपड़ी दिखाई दी। उसने हुक्म दिया कि बुढ़िया को दूसरी जगह झोपड़ी बनाने के लिए कहा जाए। सिपाहियों ने बुढ़िया को बादशाह का हुक्म सुनाया, मगर उसने उस ओर ध्यान नहीं दिया। तब एक दिन सिपाही बुढ़िया को राजा के पास ले गए। जहाँगीर ने पूछा, “बुढ़िया तू झोंपड़ी क्यों नहीं हटाती?” बुढ़िया ने जवाब दिया, “हुजूर, इससे आपकी न्यायप्रियता पर दाग लगेगा।” “क्या मतलब?” बादशाह ने पूछा। बुढ़िया बोली, “जहाँपनाह! आपके समान श्रेष्ठ और न्यायप्रिय राजा इस दुनिया में और कोई नहीं है। आपकी कीर्ति समस्त संसार तक फैली हुई है। फिर आप 'यह मेरा' 'यह तेरा' ये विचार अपने मन में क्यों ला रहे हैं? मैं तो आपके महल और बाग-बगीचों को रोज देखा करती हूँ, मगर मेरी यह छोटी-सी टूटी-फूटी झोंपड़ी भी आपकी आँखों को खटक रही है! आप यदि इस असहाय और निरपराधिन की झोंपड़ी को उजाड़ेंगे, तो लोग आपकी बुराई और निंदा करेंगे और इससे आपकी न्यायप्रियता पर आँच आएगी।” यह सुन बादशाह लज्जित हुआ। उस बुढ़िया से माफी माँगी और अपने आदेश वापस ले लिए।