दादू दिल न दुखाइए
बाबर बादशाह को कुरान का तरजुमा (रूपांतर) करने का बड़ा शौक था। तब वह राय लेने के लिए मौलवियों को उसे दिखाया करता। सभी मौलवी इस डर से कि बादशाह नाराज न हो, उसका तरजुमा पसंद करते। एक बार एक मौलवी ने तरजुमे में कोई गलती बताई। बादशाह ने जब उसे गौर से पढ़ा और समझने की कोशिश की तो उसने पाया कि तरजुमा सही था ।
मगर मौलवी द्वारा गलती बताए जाने के कारण उसने उसी समय गलती ठीक कर ली ।
मौलवी के जाने के बाद बादशाह ने अपने मुताबिक उसे फिर सुधार डाला। एक मंत्री ने जब यह देखा तो बादशाह
पूछा, “जहाँपनाह! आपने इस मूर्ख की गलती का उसी समय खंडन क्यों नहीं किया ! उसे ठीक मानकर क्यों सुधार लिया?” बादशाह ने जवाब दिया, "मौलवी की राय नेकनीयती की थी। उसे जो सही लगा, उसने बेहिचक बता दिया, इसलिए मैंने इसका जी दुखाना ठीक न समझा। दूसरे का दिल दुखाने से मायूसी और उदासी आ जाती है।"










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