विद्याधनं सर्वधनं प्रधानम्
एक बार सिकंदर के पास एक सैनिक अधिकारी आया और उसने एक सुंदर स्वर्णजटित पेटी पेश की। पूछने पर उसने यह बताया कि उसे वह पेटी ईरान में लूट में मिली थी। बादशाह उस पेटी की नक्काशी देख बेहद प्रभावित हुआ और उसने अपने दरबारियों से पूछा कि पेटी में कौन-सी कीमती और खूबसूरत चीज रखी जाए। एक दरबारी ने कीमती हीरे और जवाहरात रखने का सुझाव दिया, तो दूसरे ने कीमती वस्त्र रखने को कहा। किसी ने खजाने की चाबियों का गुच्छा रखने की, तो किसी ने गोपनीय पत्रों को रखने की सलाह दी। किन्तु बादशाह को एक भी सुझाव सही नहीं लगा ।
तब वह स्वयं मन-ही-मन सोचने लगा कि ऐसी कौन-सी वस्तु है, जिसने उसके जीवन को प्रेरणा दी है। उसका अंतर्मन बोला, “सिकंदर ! तुझे जो गौरव और ख्याति मिली है, वह न तो रुपयों-पैसों से मिली है और न सारे मुल्क को जीतने के कारण। बल्कि तूने तो हजारों-लाखों लोगों को बिना कारण मौत के घाट उतारा है। युद्ध और रक्तपात से कोई गौरव नहीं मिला।” उसकी अंतरात्मा आगे सोचने लगी कि फिर ऐसी कौन-सी वस्तु है, जिसने उसके जीवन को नयी दिशा दी है? अकस्मात् उसे ख्याल आया कि पौरुष, पराक्रम और साहस का मार्ग उसे एक ग्रंथ से मिला था। उसी से उसे अपने में छिपी शक्तियों का ज्ञान हुआ था और इसी कारण आज वह विश्व-विजयी बन सका है।
सारे दरबारी बड़ी उत्कंठा से सिकंदर के चेहरे पर उठते भावों को देख रहे थे। उन्हें जिज्ञासा हो रही थी कि आखिर सम्राट् पेटी में किस वस्तु को रखना पसंद करते हैं।
अकस्मात् सिकंदर ने आदेश दिया, "इस पेटी में महाकवि होमर लिखित महाकाव्य 'इलियड' रखो। यह मेरे लिए सबसे कीमती और बेहतरीन चीज है। इस पुस्तक ने मेरे जीवन को नया मोड़ दिया था और इसी के कारण मुझमें शौर्य भाव जाग्रत हुआ था।”










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