दुखित होहिं पर बिपित बिसेषी



स्वामी दयानंद सरस्वती एक बार गंगातट पर स्नान करने गए। वहाँ एक साधु वस्त्र धोता हुआ दिखाई दिया। उसने स्वामीजी को प्रणाम कर उनका परिचय पूछा। फिर वह उनसे बातचीत करने लगा। बातें करते-करते उसने उनसे प्रश्न किया, “आप इतने त्यागी परमहंस - अवधूत होकर भी खंडन-मंडन के जटिल जाल में स्वयं को क्यों उलझा लेते हैं? उससे अलिप्त होकर क्यों विचरण नहीं करते?"

स्वामीजी ने हँसकर कहा, “हम तो सब कुछ करके भी अलिप्त ही हैं। जहाँ तक व्यवहार का प्रश्न है, हम सामान्य जनों से प्रेम करते हुए ज्ञानयुक्त व्यवहार करते हैं... ।”

उस साधु ने बीच में ही प्रश्न किया, “आप सामान्य जन के प्रेम की बात क्यों करते हैं? श्रुति (वेद) का तो मंत्र है कि आत्मा से प्रेम करो।’और इसके समर्थन में उसने बृहदारण्यकोपनिषद् के मैत्रेयी-याज्ञवल्क्य का संवाद उद्धृत कर दिया ।

उस पर स्वामीजी ने उससे प्रश्न किया, “क्या आप आत्मा से प्रेम करते हैं?” साधु ने जवाब दिया, “हाँ।” स्वामीजी ने आगे पूछा, "बताओ प्रेममयी आत्मा कहाँ है?" साधु ने उत्तर दिया, “राजा से लेकर रंक तक और हाथी से लेकर चींटी तक सबमें आत्मा व्याप्त है।" स्वामीजी ने पुनः पूछा, “जब आत्मा सबमें व्याप्त है, तो क्या आप सबसे प्रेम करते हैं?” साधु ने जवाब दिया, “निश्चय ही।” फिर जरा नाराज हो उनसे बोला, “क्या आपको मेरी बात पर विश्वास नहीं है? क्या आप मुझे झूठा समझते हैं?"

स्वामीजी ने कहा, “मैं आपको झूठा नहीं समझता, मगर इतना अवश्य कह सकता हूँ कि आप उस महान् आत्मा से प्रेम नहीं करते। आपको अपनी भिक्षा की चिंता रहती है, आपको इस बात की चिन्ता रहती है कि आपके वस्त्र किस प्रकार साफ-सुथरे दिखाई देंगे, आपको बस अपने जीवन की चिंता रहती है, आपका ध्यान अपने भूखे पेट की क्षुधा का शमन करने की ओर जाता है, लेकिन क्या कभी आपने देश के लाखों नंगे-भूखों के पेट की ओर ध्यान दिया है? क्या आपने उनकी खुशहाली के बारे में कभी सोचा है? महात्मन्! यदि आत्मा से और विराट् आत्मा से प्रेम करना चाहते हो, तो पहले अपने हृदय में सबके प्रति समान ममता का भाव जाग्रत करो। स्वयं की भूख के साथ-साथ दूसरों की भूख का भी ख्याल करो। जो व्यक्ति दूसरों के दुःख को खुद का दुःख मानकर आचरण करता है, उसे ही 'आत्मप्रेमी' कहलाने का अधिकार है।"

यह सुनते ही उस साधु के ज्ञानचक्षु खुल गए। उसे आत्मग्लानि हुई और वह स्वामीजी के चरणों पर झुक गया।