परहित सरिस धर्म नहिं भाई
ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती पहले दिल्ली में रहते थे, बाद में वे अजमेर में आकर बस गए। एक बार उनके पास एक गरीब किसान आया और उसने विनती की कि वे उसे जमीन का इस्तनरारी (अधिकार-पत्र) दिलाने में उसकी मदद करें।
ख्वाजा उसे लेकर दिल्ली गए। बात जब उनके पुत्र फखरुद्दीन को मालूम हुई, तो उसने उनसे कहा, “आप इतने छोटे से काम के लिए यहाँ आए हैं। यह काम तो आपका कोई भी खादिम कर सकता था । आपको इतनी तकलीफ उठाने की जरूरत नहीं थी।"
तब ख्वाजा ने उससे कहा, “बेटे! हमें अपने को हमेशा दूसरों की भलाई के लिए खपाना चाहिए। यह किसान बड़ा दुःखी था। जब उसने मुझसे इस्तनरारी दिलाने की प्रार्थना की, तब मैंने नबी के दरबार में उसके लिए मिन्नत की और मुझे उधर से जवाब मिला- 'रंजोगम में शरीक होना ही बंदगी है।' और मैं उसे लेकर यहाँ चला आया।"
उनके इन शब्दों से फखरुद्दीन लज्जित हो गया। उसने सुल्तान इल्तुतमिश से उसे मांडलगाँव का पट्टा दिलवाया और अजमेर के लिए रवाना कराया ।










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