विद्याधनं सर्वधनं प्रधानम्



संत गाडगे महाराज का मुकाम बंबई में था। एक दिन वे मंदिर जा रहे थे कि उन्हें एक गरीब बूढ़ा दिखाई दिया, जो एक मकान मालिक से कह रहा था, “जरा इस चिट्ठी को पढ़कर सुना दें, बड़ी मेहरबानी होगी।” उस व्यक्ति ने चिट्ठी रख ली और उसे एक कुल्हाड़ी देकर कहा, “पहले मेरी लकड़ियाँ फाड़ दे, फिर मैं उसके बदले चिट्ठी पढ़कर सुनाऊँगा।” इस पर बूढ़ा बोला, “मुझमें लकड़ियाँ फोड़ने की ताकत नहीं रही। आप मेरी चिट्ठी वापस कर दें।

मैं इसे दूसरे से पढ़वाऊँगा।” उस व्यक्ति को गुस्सा आ गया और वह उस बूढ़े को गालियाँ देने लगा।

गाडगे महाराज वहाँ आए और उन्होंने कुल्हाड़ी लेकर सारी लकड़ियाँ फोड़ दीं और उन्होंने लकड़ियों को ठीक तरह से जमा भी दिया। फिर मकान-मालिक से बोले, “अब तो इसकी चिट्ठी वापस करोगे न !” फिर उस चिट्ठी को लेकर एक राहगीर के पास गए और जब उसने मजमून पढ़कर सुनाया, तो वे बूढ़े से बोले, "हम दोनों निरे गधे ही हैं। न तुझे पढ़ना-लिखना आता है, न मुझे और मजे की बात यह है कि हमारे पास पैसा भी नहीं हैं। हम लोग अगर चार अक्षर भी पढ़े होते, तो ऐसी गति काहे को होती? सचमुच बिना शिक्षा का आदमी पत्थर होता है, पत्थर!”