शिक्षा ताको दीजिए, जाको सीख सोहाय



एक बार गुरु गोविंदसिंह के पास एक सीधा-सादा जाट आया और उसने उनसे नौकरी देने की विनती की। उन्होंने उसे घोड़ों की सेवा करने को कहा। जब उन्होंने उसका नाम पूछा, तो उसने 'बेला' बताया। गुरु गोविंदसिंह ने आगे पूछा, “क्या कुछ लिखना-पढ़ना आता है?" "जी नहीं।” उसने जवाब दिया। तब वे बोले, "अच्छा! हम तुम्हें पढ़ाएँगे। आज से तुम इस वाक्य को रोज कहा करो- 'वाह भाई बेला, न पहचाने वक्त, न पहचाने बेला' ।”

वह बेचारा इसे ही गुरु का मंत्र जान, रोज उसका जाप करने लगा। जब दूसरे शिष्य ने उसे इस वाक्य की रट लगाते देखा, तो उन्होंने गुरुदेव से पूछा, “आपने बेला को यह कैसा वाक्य रटने के लिए दिया है?" गुरुदेव ने जवाब दिया, “जिसने बेला यानी वक्त को नहीं पहचाना, उसने इस संसार में कुछ नहीं जाना। मगर जो बेला के महत्त्व को समझ पाएगा, वह निश्चय ही पार हो जाएगा।" बेला ने जब इसे सुना तो वह उस वाक्य को ज्यादा-से-ज्यादा दुहराने लगा। गुरुदेव उसकी निष्ठा से बहुत प्रसन्न हुए और वे उसे नित्य एकांत में उपदेश देने लगे ।

अन्य शिष्यों ने जब यह देखा, तो उन्हें बेला से ईर्ष्या हुई। आखिर उनमें से एक ने एक दिन गोविंदसिंहजी से प्रश्न किया, “गुरुदेव, क्षमा करें, हम लोग आपकी निःस्वार्थ भाव से सेवा करते हैं, लेकिन आप केवल इस निरक्षर बेला को ही उपदेश देते हैं।” गोविंदसिंह ने उसके प्रश्न का जवाब न दे उससे कहा, “एक घड़ा भर भंग पीसो और घड़ा खत्म होने तक सब लोग उसका कुल्ला करो।"

घड़ा खत्म हो जाने पर उन्होंने हर एक पूछा, "नशा चढ़ा या नहीं?” सबने उत्तर दिया, “नहीं।” जब उन्होंने बेला को बुलाया, तो सबने देखा कि उसे नशा चढ़ा है और नशे में भी वह 'वाह भाई बेला...' की रट लगाए हुए है। तब गुरुदेव उस शिष्य से बोले, “क्या तुम्हारे प्रश्न का जवाब मिल गया? बेला को भंग के साथ-साथ नाम का भी नशा चढ़ा है, क्योंकि उसने इन दोनों को दिल से ग्रहण किया है, जबकि तुम लोग कोई भी काम ऊपर-ही-ऊपर करते हो, दिल से नहीं । जान लो कि जब तक भगवान् के प्रति दिल से प्रेम न हो, तब तक मुक्ति नहीं मिल सकती।”