वाद-विवाद विषाद बढ़ायी 



एक बार गौतम बुद्ध कौशांबी में विहार कर रहे थे कि एक भिक्षु ने आकर उनसे कहा, “भगवन्! यहाँ के भिक्षु बहुधा आपस में विवाद करते हैं और अपनी मुखरूपी बर्फी से एक-दूसरे को बींधते रहते हैं। अच्छा होता, आप उन्हें उचित शिक्षा देकर व्यर्थ के वाद-विवाद से परावृत्त करते।”

बुद्धदेव चुपचाप सुनकर उसके साथ मठ में गए। उस समय भी कुछ भिक्षु आपस में विवाद कर रहे थे। उन्हें संबोधित करते हुए वे बोले, “भिक्षुओं, तुम्हें परस्पर विवाद और कलह से बचना चाहिए, इसी में तुम्हारी भलाई है।” इस पर एक भिक्षु बोला, "भंते! आप हमारे कलह के बीच में न पड़ें। हम आपस में निपटने में समर्थ हैं।"

तब तथागत बोले, “आपस में निपटने से बैरभाव शांत नहीं होता, बल्कि बढ़ता है। बैरभाव रहने से वाणी कठोर हो जाती है और जो कठोर वाणी का प्रयोग करते हैं, वे स्वयं को पंडित समझते हैं। इस प्रकार का आचरण करने वालों को न तो स्वयं की चिंता होती है और न संघ-भेद की ।

हम यदि अपने चारों ओर देखें तो हमें दिखाई देगा कि पशुओं को चुराने वाले, नीच कर्म करने वाले और दूसरों के प्राण हरण करने वाले तक आपस में मिल-जुलकर रहते हैं, और यहाँ संघ में रहने वाले तुम लोग एक क्षण भी शान्ति से नहीं रह सकते।

तुम्हें विनम्र, सदाचारी और धैर्यशाली लोगों की संगति का लाभ उठाना चाहिए और यदि तुम ऐसा नहीं करना चाहते, तो तुम्हारा संघ में रहने से क्या लाभ?

क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हारे वाद-विवाद से दूसरों की शांति में बाधा पहुँचती है? इसलिए उनके लिए तुम जैसे मूर्खों की संगति की अपेक्षा अकेले ही विचरण करने में बुद्धिमानी है।"