ऊँच कर्म ते स्वर्ग है, नीच कर्म ते भोग
संत लीओ ने संत फ्रांसिस के बीमार होने की जब खबर सुनी, तो उनसे मिलने आए। थोड़ी देर लीओ प्रार्थना में लीन हो गए। अचानक उन्हें एक दृश्य दिखाई दिया, वह यह की सामने एक नदी है, जिसे कई मुसाफिर पार करने का प्रयास कर रहे हैं। किन्तु उनकी पीठ पर भारी बोझ होने के कारण नदी पार करने में उन्हें कष्ट हो रहा है। इतने में उन्होंने देखा कि कुछ को तो नदी की वेगवती धारा बहा ले गई और कुछ गिरते-संभलते आगे बढ़ रहे थे, किन्तु वे भी पीठ के बोझ को सहन न कर गिर पड़े और क्रूर काल के कराल गाल में समा गए। यह दृश्य देख संत लीओ का हृदय द्रवित हो गया, किन्तु वह दृश्य पूरा नहीं था। अकस्मात् उन्हें साधुओं का एक और झुंड आता दिखाई दिया। वे खाली हाथ थे और उनकी पीठ पर कोई भार नहीं था । वे नदी को सहजता से पार कर गए और पार करने में उन्हें कोई कठिनाई नहीं हुई। लीओ यह दृश्य देखने में इतने तल्लीन हो गए थे कि वे यह भूल गए कि वे संत फ्रांसिस के पास बैठे हैं। इतने में फ्रांसिस के शब्द सुनाई दिए- “भाई लीओ! क्या सोच रहे हो, तुम?"
यह सुनते लीओ की तंद्रा भंग हो गई और उन्होंने उस दृश्य का वर्णन करके संत से प्रश्न किया, “मैं यह समझने में असमर्थ हूँ कि जिन बेचारों की पीठ भार से लदी हुई थी, उन्हें तो नदी निगल गई और जो भार मुक्त थे, उनको जीवनदान मिल गया।”
संत फ्रांसिस ने जवाब दिया, “तुम्हारे सोचने की दृष्टि ठीक नहीं है। वास्तव में वह नदी संसाररूपी विशाल नदी थी। जो पापी थे और जिन्होंने प्रभु ईसा की शिक्षा का अनुसरण नहीं किया, उन्हें नदी बहा ले गई, किन्तु संसार की पार्थिव - अपार्थिव वस्तुओं में जिनकी जरा भी आसक्ति नहीं थी, जो यदृच्छालाभ संतुष्ट रहते थे, ऐसे व्यक्तियों को नदी पार करने में कोई बाधा नहीं हुई। वस्तुस्थिति यह है कि वे भी अपनी पीठ पर भार वहन कर रहे थे किन्तु यह भार अदृश्य था और वह था-प्रभु के क्रूस का हलका और आनंदप्रद भार। उनकी गर्दन पर भी अदृश्य भार था और वह था-प्रभु की पवित्र आज्ञारूपी जुए का भार। इसी कारण भार से लदे होते हुए भी वे संसार-सरिता को पार करने में सफल हो गए।"










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