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Vrat and Katha of "Kamda Ekadashi Vrat and Pujan Vidhi" "कामदा एकादशी व्रत की विधि एवं कथा " in hindi.


कामदा एकादशी 
Kamda Ekadashi Vrat and Pujan Vidhi

(चैत्र शक्ल एकादशी)

इस एकादशी को 'कामदा एकादशी' कहते हैं। इस दिन भगवान वासुदेव का पूजन किया जाता है। व्रत के एक दिन पूर्व (दशमी की दोपहर) जौ, गेहूं और मूंग आदि का एक बार भोजन करके भगवान का स्मरण करना चाहिए।

दूसरे दिन अर्थात एकादशी को प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प करके भगवान की पूजा अर्चना करें। दिन-भर भजन-कीर्तन कर, रात्रि में भगवान की मूर्ति के समीप जागरण करना चाहिए। दूसरे दिन व्रत का पारण करना चाहिए। जो भक्त भक्तिपूर्वक इस व्रत को करता है उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा सभी पापों से छुटकारा मिलता है। इस व्रत में नमक नहीं खाया जाता।

कथा

प्राचीनकाल में भोगीपुर नगर में पुण्डरीक नामक राजा राज्य करते थे। उनका दरबार किन्नरों व गंधर्षों से भरा रहता था, जो गायन और वादन में निपुण और योग्य थे। वहां किन्नर व गंधर्वो का गायन होता रहता था।

एक दिन नागराज पुण्डरीक के दरबार में ललित नामक गंधर्व गा रहा था। अचानक उसे अपनी प्रियतमा की याद आ गई। उसी समय उसका ध्यान भंग हो गया। उसकी स्वर लहरी व ताल बिगड़ने लगे और उसके गायन में विघ्न पड़ गया।

उस समय दरबार में कर्कट नामक ललित का प्रतिद्वंद्वी भी बैठा था। उसने ललित की त्रुटि को ताड़ लिया। उसने राजा को चुगली कर दी।

इस पर राजा पुण्डरीक को बड़ा क्रोध आया। उन्होंने उसी अवस्था में उसे राक्षस होने का शाप दे दिया। ललित राजा के शाप से शापित होकर राक्षस हो गया और राक्षस बनकर वहीं आस-पास विचरने लगा। यह देखकर उसकी पत्नी ललिता बड़ी दुखी हुई। वह भी उसके साथ-साथ भटकने लगी।

अपने पति को इस हालत में देखकर वह बड़ी दुखी होती। वह सदैव सोचती रहती कि क्या करूं...कैसे अपने पति को इस शाप से मक्ति दिलाऊं? वह जितना इस बारे में सोचती उतना ही परेशान होती।

एक दिन घूमते-घूमते गंधर्व पत्नी ललिता विन्ध्य पर्वत पर रहने वाले ऋष्यमक ऋषि के पास जा पहुंची। उसने अपने शापित पति के उद्धार के बारे में उनसे उपाय पूछा। तब ऋषि ने उसे 'कामदा एकादशी' का व्रत करने को कहा। साथ ही व्रत की सम्पूर्ण विधि बताई।
उनका आशीर्वाद लेकर गंधर्व पत्नी अपने स्थान पर लौट आई और उसने श्रद्धापूर्वक 'कामदा एकादशी' का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उसका पति शापमुक्त हो गया और उसने पुन: गंधर्व स्वरूप को प्राप्त किया।


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