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Hindi Essay on "Satsangati", "सत्संगति " for Students Complete Hindi Speech,Paragraph for class 5, 6, 7, 8, 9, and 10 students in Hindi Language

सत्संगति 
Satsangati



संगति ही गुण उपजै, संगति ही गुण जाय,
बाँस फाँस औभीसरी, एकै भाव निकाय। 

यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक अरस्तू ने मनुष्य को 'social animal" बताया। इसीलिए माना जाता है कि जैसी संगति होती है, वैसे ही गण व्यक्ति में आ जाते हैं। सत्संगति शब्द में सत् संग मूल शब्द हैं। सत् का अर्थ है-सज्जन और संग का अर्थ है-साथ। सज्जन लोगों का साथ सत्संगति कहलाता है। 

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि समाज के वातावरण का प्रभाव मनुष्य के मानस पटल पर पड़ता है। यही कारण है कि यदि व्यक्ति बुद्धिमान, गुणवान व सज्जन लोगों के साथ रहता है। तो उसमें सद्वृतियाँ जागृत होने लगती है तथा चरित्र व स्वभाव में अच्छे गुणों का समावेश होने लगता है। सत्संगति से मनुष्य की कलुषित भावनाएँ। धीरे-धीरे समाप्त हो जाती हैं। कबीरदास जैसे संतों ने अपने काव्य में सत्संगति की महिमा का गान किया है। उनका मानना है कि नीच व्यक्ति भी सत्संगति में सुधर जाता है तथा पापाचरण को छोड़कर वह धीरे-धीरे समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है-

कबीरा संगत साधु की, हरै और की व्याधि
ओछी संगति नीच की, आठों पहर उपाधि। 

मनुष्य को अपने साथियों का चुनाव सोच-समझ कर करना चाहिए। साथियों के आचरण का प्रभाव हमारे मन पर पड़ता है। सत्संगति का प्रत्यक्षा व परोक्ष प्रभाव हमारे जीवन की सफलता पर भी पड़ता है। अच्छे मित्र हमारे संकल्पों में दृढ़ साधक सिद्ध होते हैं। उनके सद्गुणों से प्रेरणा पाकर। हम दृढ़ चित्त, दृढ़ संकल्प होकर विकासोन्मुख हो पाते हैं।

अच्छे लोगों का साथ मिलने से मनुष्य का जीवन दर्शन ही बदल जाता है। आदिकवि वाल्मीकि ने डकैती का दुष्कर्म किया किंतु सत्संगति पाकर उसे छोड़ा और साहित्य सृजन का महान कार्य किया। गोस्वामी तुलसीदास का भी मानना है कि सत्संगति से बुरा आदमी भी अच्छा हो जाता है। बगीचे के आसपास की हवा भी सुगंधित हो जाती है। पारस के स्पर्श से लोहा भी सोना बन जाता है-

सठ सुधरहि सत्संगति पाई
पारस परस कुधातु सुहाई। 

सत्संगति से मनुष्य में परोपकार, दया, विवेक, साहस जैसे गुण आ जाते हैं। स्वाति नक्षत्र से गिरने वाली एक बूंद भिन्न-भिन्न साथ पाकर अलग-अलग रूप पाती है। सत्संगति के प्रभाव की महिमा का इससे पता चलता है कि स्वाति नक्षत्र की बूंद केले में कपूर, हाथी के मस्तक पर गजमुक्ता, सीप में मोती तथा सर्प के मुख में विष का रूप धारण कर लेती। है। कांच के टुकड़े भी सोने में जड़े जाने पर मणियों के समान सुशोभित होते हैं। इसी कारण कहा गया है कि व्यक्ति अपने साथ से जाना-पहचाना जाता है।
सत्संगति मनुष्य के जीवन में आशा का संचार करती है। वह सदा उल्लास व प्रफुल्लता का कारण बनती है। मनुष्य सत्संगति से समाज में। सम्मान का पात्र बनता है। जहाँ महात्माओं के शिष्य भी सम्मान के अधिकारी बनते हैं, वहीं दुष्कर्म करने वाले लोगों से मिलने वालों तक का भी लोग बुरी नजरों से देखते हैं। प्रसिद्ध विद्वान रामचंद्र शुक्ल ने भी कहा है कि कुसंग का ज्वर  बड़ा भयानक होता है।

अपने साथियों की बुरी आदतों का प्रभाव अप्रत्यक्ष रूप से हमारे स्वभाव व चरित्र में समाहित होता जाता है। तभी माना गया है कि-

काजर की कोठरी में कैसो ही सयानो जाय
एक लीक काजर की लागहि पै लागि है। 

सभी बुरे व्यसन कुसंगति से आते हैं। बुरे लोगों के साथ रहने भर ही से भले लोग बुरे माने जाते हैं। कुसंग से व्यक्ति का अपना व समाज, दोनों का अहित होता है। कुसंग से सामाजिक बुराइयाँ फैलती हैं तथा वातावरण दुषित होता है। दुर्जन के संग के कारण ही अनंत-असीम समुद्र को भी श्री राम के क्रोध का पात्र बनकर, सिमटना पड़ा।

बुरे व्यक्तियों के साथ से अनेक प्रकार की हानियाँ होती हैं। गेहूँ के साथ घुन भी पिसता है। बुरा साथ सदैव निंदा व अपयश दिलाता है और भविष्य को अंधकारमय बनाता है जबकि सत्संगति से अनेक पुण्य प्राप्त होते हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने संतों के साथ को तीर्थ के समान पवित्र बताया है।
सत्संगति जीवन को सरल, मधुर तथा हितकारी बनाती है। संस्कृत में भी कहा गया है, "सत्संगतिः कथय किं न करोति पुंसाम्" सत्संगति से मनुष्य को क्या-क्या लाभ होते हैं, इसका वर्णन करना शब्दों में कठिन है। सत्संगति से मनुष्य को लौकिक व पारलौकिक गुणों की प्राप्ति होती है। इसलिए कहा गया है
सत्संगति मद मंगल मूला, सोई विधि सब साधन फूला। सत्संगति के बिना विवेक असंभव है। सज्जनों का साथ सदा समाज में सुख-शांति बढ़ाता है। सत्संगति में मनुष्य सदा रचनात्मक कार्य करता। है तथा कसंग सदा विध्वंसकारी विचारों को जन्म देता है। यही कारण है कि प्राचीनकाल में छात्रों के लिए आश्रम व्यवस्था थी ताकि सत्संगति से उनके व्यक्तित्व का पूर्ण संतुलित विकास हो, उनमें सद्गुणों का विकास हो सके। तुलसीदास जी ने भी संसार के सब सुखों को सत्संगत के समक्ष तुच्छ माना और कहा-

तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरिए तुला इक अंग 
तूल न ताहि सकल मिलि, जो सुख लव सत्संग।

 


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