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Hindi Essay on "Madhur Vani ka Mahatva", "मधुर वाणी का महत्त्व" for Students Complete Hindi Essay, Paragraph, Speech for class 5, 6, 7, 8, 9, and 10 students in Hindi Language

मधुर वाणी का महत्त्व
Madhur Vani ka Mahatva 


मधुर वचन सुनकर किसका हदय प्रसन्न नहीं हो जाता। संसार की प्रत्येक वस्तु प्रेम से प्रभावित होती है। मनुष्य अपनी सद्भावनाओं का अधिकांशतः। प्रदर्शन वचनों द्वारा ही किया करता है। बालक की मीठी-मीठी बातें। सुनकर बड़े-बड़े विद्वानों व चिंतकों का हृदय भी खिल उठता है। तभी कहा गया है कि मधुर वचन मीठी औषधि के समान लगते हैं तो कड़वे वचन तीर के समान चुभते हैं।


मधुर वचन वास्तव में औषधि के समान दुखी मन का उपचार करते। हैं। दीन-दुखी प्राणी को सहानुभूति के कुछ शब्द उतना सुख दे देते हैं। जितना सुख संसार का कोई भी धनकोष नहीं दे सकता। मधुर वचन सुनकर श्रोता का तप्त-संतप्त हृदय राहत अनुभव करता है। मधुर वचन न केवल माननेवाले अपितु बोलनेवाले को भी आत्मिक शांति प्रदान करते हैं।


जो व्यक्ति मधुर वचन नहीं बोलते, वे अपनी ही वाणी का दुरुपयोग करते हैं। ऐसे व्यक्ति संसार में अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा खो बैठते हैं तथा अपने जीवन को कष्टकारी बना लेते हैं। कड़वे वचनों से उनके बनते काम बिगड जाते हैं तथा वे प्रतिपल अपने विरोधियों व शत्रुओं को जन्म देते हैं। उन्हें सांसारिक जीवन में सदा अकेलापन झेलना पड़ता है तथा मुसीबत के समय लोग उनसे मुँह फेर लेते हैं।


जहाँ कोयल की मीठी वाणी सबका मन मोह लेती है, वहीं कौए की कर्कश आवाज सबको बुरी लगती है। मधुर भाषी शीघ्र ही सबका मित्र बन जाता है। लोग उसकी प्रशंसा करते हैं। मधुर वचनों से पराए भी अपने बन जाते हैं। इसीलिए तुलसीदास कहते हैं-


वशीकरण एक मंत्र है तज दे वचन कठोर,

तुलसी मीठे वचन ते सुख उपजत चहुँ ओर। 


मधुर वचन बोलनेवाले सबको सुख-शांति देते हैं और सभी ऐसे लोगों का साथ पसंद करते हैं। इससे समाज में पारस्परिक सौहार्द की भावना का संचार करने में मदद मिलती है। सामाजिक मान-प्रतिष्ठा और श्रद्धा का आधारस्तंभ वाणी ही है। अपनी वाणी का प्रयोग हम जिस प्रकार करते हैं, हमें वैसा ही फल मिलता है। हम अपने वचनों से अपनी सफलता के द्वार खोल सकते हैं या असफलता को निमंत्रण दे सकते हैं।


सभी प्राणियों का मानवोचित कर्तव्य है कि दूसरे की भावनाओं का आदर करें। ऐसा करने से मनुष्य के मनुष्य से गहन-गंभीर भावपरक व मधुर संबंध बनते हैं। कहा भी जाता है कि हम जैसे व्यवहार की आशा दूसरों से अपने लिए करते हैं, हमें स्वयं भी दूसरों से वैसा ही व्यवहार करना चाहिए। तभी कहा गया है-


ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोए।

औरन को शीतल करै, आपौ शीतल होय॥ 


स्वयं को सुखी बनाने का एक साधन मधुर वचन हैं। मधुर वचन किसी के मन को ठेस नहीं पहुँचाते। कटु वचन के प्रत्युत्तर में कठोर बातें ही सुननी पड़ती हैं तथा ये बातें मन को काफ़ी कष्ट देती हैं। शरीर का घाव तो भरा जा सकता है परंतु मन का घाव भरना सरल नहीं है।


मधुर भाषण से कोमलता, नम्रता तथा सहिष्णुता की भावना का जन्म होता है। इन गुणों से व्यक्ति का व्यक्तित्व निखर उठता है। वह व्यक्ति अपने उदात्त गुणों के कारण काल और समय की सीमा पार कर अमर बन जाता है। शांत व्यक्ति ही मधुर वचन बोल पाता है जबकि क्रोधी सदा कटु वचन ही बोलता है। इस प्रकार की बातें समाज में ईर्ष्या, द्वेष, लड़ाई, वैमनस्य, निंदा आदि दुर्गुणों को जन्म देती हैं। रहीम कवि कहते हैं-


मेल प्रीति सब सौ भली, बैर न हित मित गोत।

रहिमन या ही जन्म में, बहुरि न संगत होत॥ 


मधुर भाषण करनेवाले व्यक्ति के गुण इतिहास भी गाता है। सरोजिनी नायडू अपनी मधुर व कोमल वाणी से कविता पाठ करने के कारण भारत कोकिला कहलाई। वहीं दूसरी ओर, कठोर बातें कहनेवाले व्यक्ति को कभी-कभी शर्मिंदा होना पड़ता है। शिवधनुष भंग करने के पश्चात राम-सीता विवाह हुआ। जब बारात लौट रही थी तो परशुराम क्रोधित होकर राम को भला-बुरा कहने लगे।  

राम ने उनका विरोध न किया तो उनका उत्साह बढ़ गया और उन्होंने अपशब्दों की वर्षा की किंतु राम के तेज व वीरता के सम्मुख फिर उन्हें लज्जित होना पड़ा। ऐसे कटुवचन बोलने वालों के लिए कवि ने कहा है-


खीरा मुख ते काटिए, मलिए नमक मिलाए। 

रहिमन कड़वे मुखन को चाहियै ये ही सजाय॥ 


मधुर वचन में वह शक्ति है, जो बड़े-बड़े शूरवीरों के तीरों में नहीं। मधुर वचन मनुष्य के हृदय पर प्रभाव डालते हैं। 


कठोर व अत्याचारी अंगुलिमाल नामक डाकू पर महात्मा बुद्ध के मधुर वचनों का सम्मोहनसा हो गया था। उसने अपने कठोर हत्या और हिंसा के रास्ते को छोड़कर धर्म का मार्ग अपना लिया और सन्यासी हो गया। कवि कबीर ने भी शील और आचरण की स्तुति करते हुए उसे तीनो लोकों में सर्वोत्तम गुण बताया है। मधुर वचन निश्चित रूप से संसार में प्रेम, भाईचारा तथा सुखों का संचार करते हैं। मानव को संसार की सुखशांति के लिए वाणी को नियंत्रण में रखकर सदा ही उसका सदुपयोग करना चाहिए।













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