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Hindi Essay on "Eid", "ईद " for Students Complete Hindi Essay, Paragraph, Speech for class 5, 6, 7, 8, 9, and 10 students in Hindi Language

ईद 
Eid

Essay # 1

ईद गुसलमानों का त्योहार है। इसे विश्वभर के मुसलमान उल्लासपूर्वक गगाते हैं। प्रतिवर्ष दो ईद  मनाई जाती हैं-एक ईदुलफितर और दूसरी ईदुरगुहा या सफरीद। 


इसका पूरा नाम दुलफितर या ईदुज्जुहा है। ईदुलफ़ितर का त्योहार रमजान के महीने के बाद आता है। मुसलमानों का धार्मिक कलैंडर चाँद के अनुसार चलता है। चाँद का नवाँ मास रमजान का पावन मास माना जाता है। यह पूरा मास ही उत्सव की तरह मनाया जाता है।


इस पूरे माह में मुसलमान उपवास रखते हैं। इस उपवास को रोजा कहा जाता है। इन दिनों में सूर्योदय से सूर्यास्त तक कुछ भी खाना-पीला मना होता है। इन दिनों आचार विचार की पवित्रता पर भी विशेष बल दिया जाता है। रमजान का चाँद दिखते ही अगले दिन रोजे की तैयारियों आरंभ हो जाती हैं। बच्चे-बूढ़े सब रमजान की सहरी की तैयारियों में जुट जाते हैं। इन दिनों सबके लिए नमाज पढ़ना अनिवार्य होता है।


रमजान के माह में निश्चित पाँच नमाजों के अलावा भी 'इशा' अर्थात रात की नमाया पढ़नी पड़ती है। इन्हीं नमाजों को 'तरावीह' कहा जाता है। सूर्योदय से पहले ही रोजा रखनेवाले 'सहरी' खाते हैं। इस समय दूध, फैनी आदि विभिन्न पकवान खाए जाते हैं तथा कुल्ला आदि कर रोजा आरंभ करते हैं। नमाज पढ़ने के बाद लोग दिनभर के कामों में जुट जाते है। सूर्यास्त पर नमाज के बाद रोजा खोला जाता है। इसे अफ्तार करना कहा जाता है। यह अफ्तार पानी के घूँट, खजूर या फल आदि से किया जाता है।


रमजान के पूरे माह घरों में तरह-तरह की चाट-पकौड़ी, कबाब, मिठाइयाँ आदि पकाई जाती हैं। इस प्रकार पूरा माह बीतने पर नया चाँद खुशखबरी लाता है। यह ईदुलफितर का दिन होता है। इस दिन चारों तरफ प्रसन्नता का वातावरण दिखाई देता है। मस्जिदों तथा बाजारों में विशेष सजावट दिखाई देती है।


ईद के दिन लोग नए-नए वस्त्र धारण करते हैं। मस्जिदों में इस दिन नमाज पढ़ी जाती है। मस्जिदों तथा बाजारों में विशेष सजावट दिखाई देती है। मस्जिदों के बाहर मेले लगते हैं। सब एक-दूसरे को ईद मुबारक कहते हैं तथा गले मिलते हैं। इस दिन बड़े छोटों को 'ईदी' अर्थात ईद का उपहार देते हैं।


ईद के दिन तरह-तरह के पकवानों के साथ घरों में खास सेवइयाँ भी। पकाई जाती हैं। लोग मित्रों, रिश्तेदारों के साथ प्रेमपूर्वक यह पर्व मनाते हैं। जगह-जगह पर ईद मिलन के कार्यक्रम होते हैं। खाने-पीने के साथसाथ शेरो-शायरी तथा गजलों की महफ़िलें सजती हैं। चारों तरफ़ चमचमाते कपड़े, सजी-धजी दुकाने, पकवान, हँसी-उल्लास दिखाई देता है। बच्चों में ईदी पाने का विशेष उत्साह दिखाई देता है।


इसके लगभग दो माह नौ दिन बाद ईदुज्जुहा का पर्व मनाया जाता है। इस अवसर पर बहुत-से मुसलमान हज के लिए जाते हैं। इस दिन मुसलमान भेड़-बकरी आदि की कुरबानी देते हैं। माना जाता है कि हजरत इब्राहीम अपने बेटे को खुदा की राह में कुरबान करने को तैयार हो गए थे तब खुदा ने उसके बजाय एक मेंढ़ा कुरबानी के लिए भेज दिया था। तब से यह कुरबानी प्रतिवर्ष याद की जाती है तथा ईदुज्जुहा के रूप में मनाई जाती है। 


ईदुज्जुहा के दिन भी मस्जिदों में विशेष नमाज पढ़ी जाती है। लोग एक-दूसरे को ईद मुबारक कहते हैं। इसके बाद भेड़ या बकरी की कुरबानी देते हैं तथा गोश्त गरीबों में तथा सगे-संबंधियों में बाँट दिया जाता है। इस अवसर पर भी बच्चों को ईदी मिलती है। वे तरह-तरह के खिलौने आदि खरीदते हैं। ईद के अवसर पर सामूहिक आयोजन भी किए जाते हैं। इस अवसर के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लोग उल्लास व उमंग से भाग लेते है। यह परस्पर सौहार्द, सहयोग, मिलन व भाईचारे का पर्व है।


ईद 
Eid

Essay # 2

जिस प्रकार दीपावली हिन्दुओं का, क्रिसमस ईसाइयों का प्रमुख त्योहार है उसी प्रकार मुसलमानों की प्रसन्नता व उत्साह का पर्व ईद है। हर मुसलमान ईद के त्योहार को नियम-पूर्वक मनाता है। इस पर्व का पूरा नाम 'ईद-उल-फितर' है। ईद का अर्थ फिर से तथा फितर का अर्थ है खाना-पीना। इस प्रकार अर्थ हुआ खाने-पीने का फिर से लौटना। मुसलमानों के एक महीने का नाम रमजान है। माना जाता है कि इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद साहब ने इस महीने कठोर साधना की तथा उन्हें कुरान शरीफ लिखने की प्रेरणा मिली। रमजान के महीने में रोजा रखते हैं अर्थात दिन भर का उपवास रखते हैं। पूरे महीने के उपवास के बाद चाँद के दिखाई देने पर उसके अगले महीने 'शव्वाल' की पहली तारीख को ईद का त्योहार मनाया जाता इस दिन सभी नए कपड़े पहनते हैं। ईदगाह जाकर सामूहिक नमाज अदा की जाती है। एक-दूसरे के गले मिलकर मुबारकबाद दी जाती है। इस दिन शत्रुता को भुला दिया जाता है। नए रिश्ते स्थापित किए जाते हैं। ईद के दिन मित्रों व संबंधियों को दावत दी जाती है। सेवई और मिठाई खाई व खिलाई जाती है। यदि हम नियमपूर्वक एक महीने रोजे की सखितयाँ न बरतते तो ईद की खुशियाँ कैसे मिलती। अतः कहा जा सकता है कि खुशियाँ मनाने का हक उसी को है जो तपस्या करते हैं, कष्ट सहते हैं। 





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