भारतीय गाँव


Indian Village


भारत गांवों का देश है। भारत की आत्मा यहाँ के गांवों में निवास करती। है। हमारे देश का अस्सी प्रतिशत क्षेत्र ग्रामीण है। यहाँ के गाँव यहाँ की सभ्यता व संस्कृति के वाहक हैं। भारतीय गाँव भारतीय जीवन-दर्शन कला-संस्कृति, रहन-सहन, आचार-विचार के दर्पण हैं।


गांवों में आज भी अधिकांश लोग आधुनिक वैज्ञानिक सभ्यता से वंचित जीवन व्यतीत कर रहे हैं। वे सादा जीवन बिताते हैं। भारत के गाँवों में कुछ घर पक्के व कुछ आज भी कच्चे हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में गरीबी ज्यादा देखी जा सकती है। अधिकांश लोग खेती पर निर्भर हैं, शेष कारीगर हैं। गाँव के लोग शहर की तड़क-भड़क से कोसों दूर हैं। 


गाँव की सैर करने पर खेतों की हरियाली, पनघट के दृश्य आज भी गत शताब्दी का स्मरण करा देते हैं। अधिकांश भारतीय गांवों के लोग आज भी तालाबों व बावड़ियों से पेय जल लेते हैं। कुछ लोग नहरों के जल का प्रयोग भी करते हैं। कुछ स्थानों को छोड़कर अधिकतर स्थानों पर पेय जल स्रोतों के निकट स्वच्छता का पर्याप्त अभाव पाया जाता है। यंत्र-तंत्र कीचड़ व गंदगी के दर्शन होते हैं।


गाँवों की शोभा उनके हरे-भरे खेतों में दिखाई पड़ती है। कहीं गेहूँ-बाजरे के खेत हैं तो कहीं पर मक्का के हरे-भरे पौधे झूम-झूमकर अपनी प्रसन्नता प्रकट करते हैं। कहीं दूर-दूर तक गन्ने के खेत हैं जिनकी गंध हवा में समा जाती है। आजकल सूरजमुखी के खेतों की सुंदरता के दर्शन भी गांवों में किए जा सकते हैं। चारों तरफ फूलों का साम्राज्य मन को अद्भुत उल्लास व शांति प्रदान करता है। इन्हीं खेतों में कहीं सरसों के पीले फूलों की छटा छाई है तो कहीं हरी-भरी सब्जियों से लदे पौधे व लताएँ यहाँ-वहाँ फैली हैं।


इन खेतों में चिलचिलाती धूप, आँधी-तूफान, सरदी-गरमी कुछ भी हो, किसान व उसके परिवार को कर्मरत देखा जा सकता है। सुबह से शाम तक रंग-बिरंगे वस्त्र पहने पुरुष व महिलाएँ खेतों में जुटे रहते हैं। कभी घुटने-घुटने पानी में धान के पौधे रोपना, कभी गडाई तो कभी सिंचाई में किसान सदा व्यस्त रहते हैं। खेतों में चलते ट्यूबवेल, ढेकुली आदि। शहरी लोगों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र होते हैं। हरे-भरे खेतों के मध्य नालियों में दौड़ता तेज ठंडा पानी दिनभर की थकान हरने की क्षमता रखता है।


यहाँ कहीं पर बुनकर खड्डी पर तरह-तरह के रंगीन ताने-बाने से सुंदर वस्त्र तैयार करते हैं, कहीं पर लुहार अपनी भट्ठी की आग सुलगाकर लोहे के बरतन, हल व अन्य औजार बना रहे होते हैं। कहीं पर कुम्हार मिट्टी के घड़े, बरतन आदि बनाने में जुटे रहते हैं। वहीं उनके पास कच्चे बरतन सूख रहे होते हैं तथा दूसरी ओर भट्ठी में बरतन पक रहे होते हैं। कुम्हारों की स्त्रियाँ व बच्चे कुछ मूर्तियों को सुंदर व आकर्षक रंग-रूप प्रदान करते हैं। सरदियों के दिनों में गाँवभर में गुड़ बनने की सुगंध फैली रहती है। बड़े-बड़े कड़ाहों में गन्ने का रस पकाकर गुड़ तैयार किया जाता है।


भारत के गांवों में आज भी अशिक्षा तथा अज्ञानता का वास है। गत बीस-पचीस सालों में अनिवार्य शिक्षा नीति के कारण कुछ सुधार अवश्य दृष्टिगोचर होते हैं-किंतु फिर भी काफी लोग अशिक्षित है। यही कारण कि वे आज भी अंधविश्वासी हैं। आज भी सेठ, साहूकार व समीदारी का शोषण व्याप्त है। जन्मोत्सव, विवाह, पारिवारिक उत्सव आदि के समय लिए जानेवाले कर्ज के बोझ के तले दबे किसानों की जमीन तक नीलाम हो जाती है। भारतीय ग्रामीण शिक्षा के अभाव में न तो अपना और न भावी पीढ़ी के भविष्य को उचित दिशा दे पाते हैं। सरकार की तरफ़ से जिला स्तर पर औषधालय तथा छोटे-छोटे गांवों में चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के पश्चात आज भी जादू-टोने तथा ओझाओं के गंडे-तावीज देखे जा सकते हैं। धर्मभीरू भारतीय ग्रामीणों को ये कर्मकांडी आज भी मूर्ख बना रहे हैं। 


शायद, ये सब देखकर ही कवि सुमित्रानंदन पंत ने लिखा-


विश्व-प्रगति से निपट अपरिचित, 

अर्थ सभ्य, जीवन रुचि संस्कृत, 

रूढ़ि रीतियों से गति कुंठित,

 राहु ग्रसित शरदेन्दु हासिनी,

भारत माता ग्रामवासिनी। 


गाँवों में उत्सव-पर्व के अवसर पर तरह-तरह के खेलो, नाच-गाने का आयोजन किया जाता है। फसल कटने के बाद खेतों में अनाज के ढेर दिखाई देते हैं। पशुओं को खिलाने के लिए भूसे के ढेर अलग तयार किए। जाते हैं। प्रायः हर घर में पालतू भैंस, गाय और बैल होते हैं। कुछ लोग बकरियां, ऊँट आदि भी पालते हैं। इन पशुओं को भी उत्सव के समय रंगों से सजाया जाता है। देर रात तक ढोलक बजने की आवाजें खेतों में गूंजती रहती हैं। फसलें कटने के बाद देशभर में ओणम, बैसाखी, होली जैसे रंगभरे त्योहार मनाए जाते हैं। दक्षिण भारत के गाँव हों या उत्तर भारत के, किसान का जीवन लगभग एक समान ही है। केवल वेशभूषा व का अंतर है। उनके विचार, उत्सव, जोश, उमंग, रहन-सहन में कोई विशेष अंतर दिखाई नहीं पड़ता। खेतों में उगी ताजी सब्जियाँ व स्वच्छ वायु उनके स्वास्थ्य में चार चाँद लगाती हैं।


भारतीय कला-संस्कृति, दर्शन, शिल्प, रहन-सहन संबंधी अनेक विभिन्नताओं तथा समानताओं के दर्शन भारतीय गांवों में किए जा सकी। हैं। आधुनिक समय में बिजली, सड़क, चिकित्सा, शिक्षा, उपकरण आदि नागरिक जीवन को सुख-सुविधा और विशिष्टता प्रदान करने वाली आधुनिक सभ्यता की प्रतीक स्वरूप वस्तुएँ अब सुदूर गाँवों में भी उपलब्ध होती जा रही हैं। सघन वन प्रांतों और गगनचुंबी पर्वतमालाओं के बीच स्थित गांव भी आधुनिक सभ्यता के प्रभाव क्षेत्र में आते जा रहे हैं। हालांकि समस्त कुटीर उद्योग-धंधों तथा शिल्पियों की जड़ें आज भी भारत के गाँवों में ही हैं। गाँवों के जीवन का वर्णन करते हुए राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त लिखते हैं-


अहा! ग्राम्य जीवन भी क्या है। 

क्यों न इसे सबका जी चाहे।। 

थोड़े में निर्वाह यहाँ है। 

ऐसी सुविधा और कहाँ है।।