Hindi Essays, English Essays, Hindi Articles, Hindi Jokes, Hindi News, Hindi Nibandh, Hindi Letter Writing, Hindi Quotes, Hindi Biographies

Hindi Essay on "Mera Priya Upanyas - Prem Chand", "मेरा प्रिय उपन्यासकार - प्रेमचंद " for Students, Complete Hindi Essay, Paragraph, Speech for class 5, 6, 7, 8, 9, 10, 12 Exam.

मेरा प्रिय उपन्यासकार - प्रेमचंद 
Mera Priya Upanyas - Prem Chand


हिंदी उपन्यास जगत को उचित दिशा दिखाने वाले उपन्यास-सम्राट प्रेमचंद के नाम से भला कौन परिचित नहीं? वे वस्तुतः हिंदी के प्रथम मौलिक उपन्यासकार तथा युगप्रवर्तक हैं। प्रेमचंद के उपन्यासों में प्रथम बार जन सामान्य को वाणी मिली, इसी कारण वे मेरे प्रिय उपन्यासकार हैं।

मुंशी प्रेमचंद ने उपन्यास को तिलस्म और प्रेमाख्यान के दलदल से निकालकर मानव-जीवन के सुदृढ़ धरातल पर ला खड़ा किया। प्रेमचंद उपन्यासों की रचना भारतीय परिप्रेक्ष्य में अत्यंत रोचक व मार्मिक ढग का और उन्होंने जीवन के यथार्थ को कल्पना के मार्मिक रंगों से रँगा। सामाज में फैली विषमताओं को, विशेषकर भारत के किसान तथा मध्यमवर्ग की बहुमुखी समस्याओं को कलात्मक बाना पहनाकर प्रस्तुत किया। यी व्यापकता उन्हें अन्य भारतीय उपन्यासकारों से श्रेष्ठ सिद्ध करती है।

 

मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई, सन 1880 को वाराणसी के लमही नामक गाँव में हुआ। इनके पिता अजायब राय डाकखाने में लिपिक थे। इनकी माता आनंदी इन्हें धनपतराय पुकारती थीं। धनपत की माता अकसर बीमार रहती थीं। जब वे सात वर्ष के थे, तब सन 1887 में इनकी माता आनंदी देवी का स्वर्गवास हो गया। इनके पिता ने शीघ्र ही दूसरा विवाह। कर लिया। धनपत का सारा बचपन विमाता के क्रोध, लांछन तथा डाँट सहते हुए बीता।

 

धनपत की पढ़ाई अभी चल ही रही थी कि इनका विवाह हो गया। धनपत के पिता चल बसे। परिवार की ज़िम्मेदारी ने धनपत को अत्यंत संवेदनशील बना डाला।

 

प्रेमचंद ने 'जीवन सागर' में अपने इन दिनों की दुर्दशा का वर्णन किया है, "पाँव में जूते न थे, देह पर साबुत कपड़े न थे, महँगाई अलग थी। काशी के क्वींस कॉलेज में पढ़ता था। हेडमास्टर ने फ़ीस माफ़ कर दी थी। इम्तहान सिर पर था। मैं एक लड़के को पढ़ाने जाता था। चार बजे पहुंचता था। पढ़ाकर छह बजे छुट्टी पाता। वहाँ से घर आठ किलोमीटर पर था। तेज़ चलने पर भी आठ बजे से पहले घर न पहुँचता।"

 

इन विषमताओं में उन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा दी। कई बार असफल हुए तथा कई वर्ष बाद यह परीक्षा पास की। घर का खर्च चलाना कठिन हो रहा था तब एक स्कूल में दस रुपए मासिक वेतन पर नौकरी की।

 

धनपत को कहानियाँ, किस्से पढ़ने का काफ़ी शौक था। जो कुछ भी समय मिलता, वे उसमें किस्से-कहानियाँ पढ़ते तथा उनमें अपनी कल्पना का समावेश कर एक नई कहानी लिख डालते। 1901-1902 के बीच उनकी रचनाएँ 'नवाबराय' के नाम से 'जमाना' जैसी पत्रिकाओं में छपने लगीं प्रेमचंद के पिता उन्हें प्यार से नवाब पुकारते थे। हंस, मर्यादा, जमाना आदि पत्रिकाओं में इनका लेखन-कार्य चलता रहा।

 

प्रेमचंद ने दो प्रकार के उपन्यास लिखे - राजनैतिक और सामाजिक। सभी उपन्यासों की विषयवस्तु भारतीय जनजीवन से जुड़ी हुई है। उनके भासदन' उपन्यास में मध्यमवर्ग की विडंबनाओं का चित्रण किया गया है। 'प्रेमाश्रम' में ग्राम्य जीवन, 'सेवासदन' में वेश्यावृत्तिजन्य समस्याओं का वर्णन है। रंगभूमि' इनका महा-उपन्यास है। इसका कथानक व्यापक है तथा इसमें शासक वर्ग के अत्याचार तथा जनसाधारण की बेबसी का कथानक है। आम व्यक्ति इनके उपन्यासों में अपने जीवन के किस्से घटित होते पाता है। 'कर्मभूमि में जनता की साम्राज्य विरोधी भावना, 'निर्मला' में अनमेल विवाह तथा 'गोदान' में किसान और मजदूरों के शोषण की कथा को अत्यंत मार्मिक व सरल ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

 

प्रेमचंद के उपन्यासों में यथार्थ के अधिक तथा आदर्श के कम दर्शन होते हैं। उन्होंने आम व्यक्ति के जीवन की घटनाओं को अपने कथा के ताने-बाने में अत्यंत कलात्मक रूप से गढ़ा है। यही सरल कलात्मकता तथा यथार्थवादिता उनकी रचनाओं को अमर बनाती है। प्रेमचंद के पात्र सरल, सजीव साधारण मानवमात्र हैं। उनके चरित्र में अच्छाइयों तथा बुराइयों का समावेश है। राजा से रंक तक हर वर्ग को प्रेमचंद ने लेखनी-बद्ध किया।

 

आचार्य हजारी प्रसाद दविवेदी ने उपन्यास सम्राट प्रेमचंद की उपन्यास रचना की प्रशंसा करते हए लिखा-प्रेमचंद शताब्दियों से पददलित, अपमानित और उपेक्षित कृषकों की आवाज़ थे। पर्दे में कैद, पग-पग पर लांछित और असहाय नारी जाति की महिमा के जबरदस्त वकील थे। गरीबों और असहायों के महत्त्व के प्रचारक थे। अगर आप उत्तर भारत को समस्त जनता के आचार-विचार, भाषा-भाव, रहन-सहन, आशा-आकांक्षा, दुख-सुख और सूझ-बूझ जानना चाहते हैं तो प्रेमचंद से उत्तम परिचायक आपको नहीं मिल सकता। झोपड़ियों से लेकर महलों, खोमचेवालों से लेकर बैंकों, गाँव से लेकर धारा-सभाओं तक आपको इतने कोशलपूर्वक और प्रामाणिक भाव से कोई नहीं ले जा सकता।

 

प्रेमचंद अपने जीवन के अंतिम दिनों तक लिखते रहे। उनि प्रातिशील लेखकों की सभा में अध्यक्ष पद से भाषण देते हुए कहा, "मैं मजद जिस दिन न लिखू, उस दिन मुझे रोटी खाने का अधिकार नहीं।

 

प्रेमचंद ने अपने कथानक के द्वारा समाज में व्याप्त शोषण,अत्याचार, अन्याय, असमानता पर प्रकाश डाला तथा जन साधारण की भावनाओं को झकझोर देने वाले उत्कृष्ट साहित्य की रचना की। अक्टूबर के दिन इस महान साहित्यकार का स्वर्गवास हुआ। उपन्यास तथा कहानी। जगत के सम्राट प्रेमचंद ने अपना समस्त जीवन साहित्य सेवा में अमित कर हिंदी साहित्य को अनेक अभूतपूर्व अमर कृतियाँ प्रदान की।



Post a Comment

0 Comments